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    देश के बड़े शहरों में खत्म हो रही जमीन, बढ़ती आबादी के बीच कहां रहेंगे लोग?

    News DeskBy News DeskJune 26, 2026No Comments4 Mins Read
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    देश के बड़े शहरों में खत्म हो रही जमीन, बढ़ती आबादी के बीच कहां रहेंगे लोग?
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     नई दिल्ली

    पिछले कुछ दशकों में भारत की तस्वीर तेजी से बदली है, कभी गांवों का देश कहा जाने वाले भारत की एक बहुत बड़ी आबादी रोजगार, बेहतर शिक्षा और आधुनिक जीवनशैली की तलाश में शहरों का रुख कर चुकी है, लेकिन इस सामूहिक पलायन ने एक गंभीर और डरावने सवाल को जन्म दे दिया है, जब शहरों में ज़मीन सीमित है, तो आने वाले समय में ये लोग रहेंगे कहां रहेंगे। 

    रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2030 तक भारत की 40% से अधिक आबादी शहरों में रह रही होगी, इतनी बड़ी आबादी का दबाव झेलने के लिए हमारे शहरों के पास पर्याप्त जगह ही नहीं बची है. ज़मीन का यह संकट अब केवल एक अंदेशा नहीं, बल्कि हकीकत बन चुका है। 

    देश के प्रमुख आर्थिक केंद्र इस समय ज़मीन की भारी किल्लत से जूझ रहे हैं. मुंबई भौगोलिक रूप से तीन तरफ से पानी से घिरा है. कई रिपोर्ट्स बताती हैं कि मुंबई के पास अब हॉरिजॉन्टल विस्तार के लिए जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं बचा है. यही वजह है कि यहां झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बढ़ी और रीडेवलपमेंट ही एकमात्र रास्ता रह गया. जमीन की कमी के कारण मुंबई भारत का सबसे महंगा और घना शहर बन चुका है। 

    नोएडा में जमीन खत्म होने के कगार पर 
    दिल्ली-NCR का सबसे पसंदीदा डेस्टिनेशन माना जाने वाला नोएडा भी अब इसी संकट के मुहाने पर खड़ा है. हालिया मीडिया रिपोर्ट्स और नोएडा अथॉरिटी की बैठकों से यह साफ हुआ है कि मूल नोएडा (Noida Master Plan 2031 के तहत) में अब नया अलॉटमेंट करने के लिए ज़मीन लगभग खत्म हो चुकी है. औद्योगिक, कमर्शियल और आवासीय प्लॉट्स के लिए अथॉरिटी के पास जगह नहीं बची है. यही वजह है कि अब उत्तर प्रदेश सरकार को 'न्यू नोएडा' (दादरी-नोएडा-गाजियाबाद इनवेस्टमेंट रीजन) बसाने के लिए मास्टर प्लान 2041 को मंजूरी देनी पड़ी है, जिसके तहत बुलंदशहर और गौतमबुद्ध नगर के 80 गांवों की जमीन अधिग्रहित की जा रही है। 

    क्या है इसका विकल्प? 
    जब ज़मीन खत्म हो रही हो, तो शहरों के पास फैलने का नहीं, बल्कि ऊपर उठने का ही विकल्प बचता है, आने वाले समय में शहरी आबादी पूरी तरह से हाईराइज इमारतों और वर्टिकल लिविंग पर निर्भर हो जाएगी. आने वाले समय में सरकारें FSI यानी ज़मीन के मुकाबले कितनी ऊंची इमारत बनाई जा सकती है के नियमों को और ढीला करेंगी, जहां पहले 4 से 5 मंजिला इमारतें बनती थीं, अब 40 से 50 मंजिला आवासीय टावर आम हो जाएंगे, एक ही एकड़ ज़मीन पर अब 50 परिवारों के बजाय 500 परिवार रह सकेंगे। 

    भविष्य के शहर हाईराइज सोसायटियों के अंदर सिमट जाएंगे. इन्हें 'वर्टिकल विलेज' कहा जाता है, जहां एक ही गगनचुंबी इमारत या परिसर के भीतर पार्क, जिम, स्विमिंग पूल, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और यहां तक कि स्कूल-अस्पताल भी मौजूद होंगे. लोगों की जमीन से निर्भरता पूरी तरह खत्म हो जाएगी. नोएडा की तर्ज पर अब हर बड़े शहर के पास जैसे न्यू नोएडा, नवी मुंबई, न्यू गुड़गांव बसाए जा रहे हैं. साथ ही रेलवे और मेट्रो स्टेशनों के आसपास हाई-डेंसिटी ऊंची इमारतें बनाई जा रही हैं ताकि लोग कम ज़मीन में रहकर सीधे पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल कर सकें। 

    क्या हैं चुनौतियां?
    बेशक हाईराइज इमारतें जमीन की कमी का समाधान हैं, लेकिन यह राह इतनी आसान नहीं है. 50 मंजिला इमारत में रहने वाले लोगों के लिए पानी, बिजली और सीवरेज सिस्टम का मैनेजमेंट करना बेहद जटिल होता जा रहा है. कंक्रीट के इन ऊंचे जंगलों के कारण शहरों में 'अर्बन हीट आइलैंड' बन रहे हैं, जिससे शहरों का तापमान गांवों के मुकाबले 3 से 5 डिग्री तक ज्यादा रहता है. भूकंप या आग लगने की स्थिति में इतनी ऊंची इमारतों से लोगों को सुरक्षित निकालना आज भी एक बड़ी चुनौती है। 

    गांवों से शहरों की तरफ बढ़ता इंसानी सैलाब रुकने वाला नहीं है और जमीन को रबर की तरह खींचा नहीं जा सकता, इसलिए भविष्य के भारत को 'आसमान' में ही अपनी जगह ढूंढनी होगी। 

    News Desk

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