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    भारत ने रोका सिंधु का पानी, संकट में घिरा पाकिस्तान; बाढ़ आते ही बदली कहानी, अब सिंधु सभ्यता का सहारा क्यों?

    News DeskBy News DeskJune 26, 2026No Comments11 Mins Read
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    भारत ने रोका सिंधु का पानी, संकट में घिरा पाकिस्तान; बाढ़ आते ही बदली कहानी, अब सिंधु सभ्यता का सहारा क्यों?
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    नई दिल्ली

    पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को स्थगित करने का फैसला लिया. इसके बाद पाकिस्तान में भयंकर पानी का संकट खड़ा हो गया. जिसकी गूंज उसके सरकारी दफ्तरों से लेकर सड़कों तक सुनाई देने लगी. पाकिस्तान के जल प्रबंधन से जुड़े आधिकारिक दस्तावेज बताते हैं कि 2025 के खरीफ सीजन की शुरुआत में वहां के अधिकारी 21 फीसदी तक पानी की कमी का अनुमान लगा रहे थे. झेलम और चिनाब नदी में पानी के कम फ्लो को लेकर चिंता बढ़ रही थी. पंजाब और सिंध जैसे कृषि प्रधान प्रांतों में आशंका थी कि सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिलेगा. हालात ऐसे बन रहे थे कि पाकिस्तान को अपने जलाशयों का इस्तेमाल बेहद सावधानी से करना पड़ सकता था. लेकिन तभी प्रकृति ने ऐसा मोड़ लिया जिसने पूरी तस्वीर बदल दी। 

    दिलचस्प बात यह है कि जिस संकट की तैयारी पाकिस्तान कर रहा था, वह आखिरकार आया ही नहीं. भारत के फैसले के बाद जल संकट का डर लगातार बढ़ रहा था. पाकिस्तान के अधिकारियों ने अपनी बैठकों में ‘चिनाब नदी में भारत की ओर से कम जल आपूर्ति के कारण पैदा हुए संकट’ का भी जिक्र किया. लेकिन कुछ महीनों बाद ऊपरी इलाकों में बर्फ तेजी से पिघली और अगस्त 2025 में आई भीषण बाढ़ ने पाकिस्तान की जल स्थिति को पूरी तरह बदल दिया. जो देश पानी की कमी से जूझने की तैयारी कर रहा था, उसके जलाशय कुछ ही महीनों में लगभग पूरी क्षमता तक भर गए. हालांकि यह राहत स्थायी नहीं मानी जा रही, क्योंकि अब एक नया और कहीं बड़ा खतरा सामने खड़ा दिखाई दे रहा है। 

    जल संकट की तैयारी में जुटा था पाकिस्तान
    पाकिस्तान की आधिकारिक रिपोर्ट के मुताबिक खरीफ सीजन शुरू होने से पहले देश के दो सबसे बड़े जलाशय टरबेला और मंगला लगभग डेड स्टोरेज स्तर के करीब पहुंच चुके थे. पिछले सीजन का बचा हुआ पानी भी बेहद कम था. ऐसे में अधिकारियों ने पूरे सिस्टम में करीब 21 फीसदी जल कमी का अनुमान लगाया था. हालात को देखते हुए पूरे सीजन के लिए जल वितरण योजना को भी टाल दिया गया था. सबसे ज्यादा असर पंजाब और सिंध पर पड़ने की आशंका जताई गई थी, क्योंकि पाकिस्तान की सिंचित कृषि का बड़ा हिस्सा इन्हीं क्षेत्रों पर निर्भर करता है। 

        पाकिस्तानी अधिकारियों की चिंताओं की वजह भी थी. रिपोर्ट के अनुसार कई बैठकों में झेलम-चिनाब नदी प्रणाली में कम जल प्रवाह को लेकर गंभीर चर्चा हुई. एक बैठक में अधिकारियों ने साफ तौर पर कहा कि ‘चिनाब नदी में भारत की ओर से कम आपूर्ति के कारण पैदा हुए संकट’ से निपटने के लिए जलाशयों का संचालन बेहद सावधानी से करना होगा ताकि सभी प्रांतों को निर्धारित हिस्से का पानी मिल सके। 

    फिर बदली किस्मत, बाढ़ बनी वरदान
    सीजन के दूसरे हिस्से में मौसम ने अप्रत्याशित करवट ली. ऊपरी सिंधु बेसिन में तापमान बढ़ने से बर्फ तेजी से पिघलने लगी. इससे नदी में पानी का प्रवाह बढ़ गया. इसके बाद अगस्त 2025 के आखिर में चिनाब और पूर्वी नदियों के जलग्रहण क्षेत्रों में भारी बारिश हुई. इस बारिश ने बड़े पैमाने पर बाढ़ की स्थिति पैदा कर दी. रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान ने खरीफ सीजन के लिए 104.03 मिलियन एकड़ फीट (MAF) जल प्रवाह का अनुमान लगाया था. लेकिन वास्तविक जल प्रवाह 122.36 MAF दर्ज किया गया, जो अनुमान से करीब 18 फीसदी अधिक था. इससे पाकिस्तान का पूरा जल संतुलन बदल गया. जहां पहले कमी की आशंका थी, वहीं बाद में जरूरत से ज्यादा पानी मिलने लगा। 

    99 फीसदी तक भर गए जलाशय
    बाढ़ और बर्फ पिघलने से मिले अतिरिक्त पानी का असर बहुत जल्दी दिखाई देने लगा. सितंबर 2025 तक पाकिस्तान के प्रमुख जलाशय लगभग 99 फीसदी क्षमता तक भर चुके थे. सीजन की शुरुआत में जो जलाशय डेड स्टोरेज के करीब थे, वे कुछ ही महीनों में पानी से लबालब हो गए. रिपोर्ट में कहा गया है कि कोटरी बैराज के नीचे बहने वाले अतिरिक्त पानी की मात्रा 30.85 MAF तक पहुंच गई थी. यह अनुमानित मात्रा से तीन गुना अधिक और पिछले पांच सालों के औसत से लगभग 71 फीसदी ज्यादा थी. यानी जिस संकट से पाकिस्तान डर रहा था, उसे प्रकृति ने अस्थायी तौर पर टाल दिया। 

    लेकिन अब सामने है टरबेला डैम का बड़ा संकट
    हालांकि पाकिस्तान को बाढ़ ने तत्काल संकट से राहत दिला दी, लेकिन उसकी जल व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी अब भी बरकरार है. रिपोर्ट में सबसे ज्यादा चिंता टरबेला जलाशय की घटती क्षमता को लेकर जताई गई है. टरबेला पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक डैम नहीं, बल्कि उसकी कृषि और जल सुरक्षा की रीढ़ माना जाता है. जब टरबेला डैम शुरू हुआ था तब इसकी लाइव स्टोरेज क्षमता 9.68 MAF थी. लेकिन अब यह घटकर करीब 5.73 MAF रह गई है. यानी दशकों में इसमें लगभग 48 फीसदी क्षमता की कमी आ चुकी है. इसका मुख्य कारण तलछट (Sediment) का लगातार जमा होना बताया गया है। 

    इस्लाम भूला पाकिस्तान, सिंधु घाटी सभ्यता को क्यों कर रहा याद

    पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने जो सिंधु जल समझौते पर भारत को जंग की धमकी दी तो भारत ने जवाब तो दे दिया. लेकिन पिछले साल से पाकिस्तान एक और बड़ा खेल खेलने लग गया है जिसपर ध्यान देने की ज़रूरत है. आज तक पाकिस्तान कभी सिंधु घाटी सभ्यता का नाम भी नहीं लेता था. वो तो अपने स्कूलों-कॉलेजों में उसके बारे में ना ज़्यादा पढ़ाता था और ना ही ज़्यादा कोई रिसर्च वगैरह करवाता था. क्योंकि पाकिस्तान ने अपनी पहचान ही इस्लाम पर खड़ी कर के रखी है. और अपना इतिहास भी वहीं से शुरू हुआ मानता है, जब साल 712 में मोहम्मिद बिन क़ासिम ने हमला कर के सिंध पर क़ब्ज़ा कर लिया था. यानी आज तक वो अपने लोगों को भी यही पढ़ाता था कि जहां से इस्लाम इस इलाक़े में आया वहीं से एक तरह से इतिहास शुरू होता है. लेकिन अब उसको अचानक सिंधु घाटि सभ्यता याद आने लग गई है. अब वो अचानक पिछले कुछ दिनों में सिंधु घाटी सभ्यता को अपनी राष्ट्रीय पहचान का बहुत बड़ा हिस्सा बताता फिर रहा है। 

    ये कोई छोटा-मोटा बदलाव नहीं है. सोचने वाली बात ये कि है कि अब अचानक पाकिस्तान को हड़प्पा और मोहनजोदड़ो (मूअन-जो-दड़ो) से इतना प्यार कहां से हो गया? किसको बेवकूफ़ बनाने की कोशिश हो रही है ये? ये सिंधु नदी के पानी पर अपना ऐतिहासिक हक़ जताने का पैंतरा है, ये क्या किसी को समझ नहीं आ रहा? मूअन-जो-दड़ो में सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ी खुदाई 1965 में पाकिस्तान ने रुकवा दी थी. एक अमेरिकी जॉर्ज डेल्स तब वो खुदाई कर रहे थे. लेकिन पाकिस्तान तो अपने को फ़ारस की सभ्यता से जुड़ा हुआ बताने में ज़्यादा इंटरेस्टेड, अरब की इस्लामी सभ्यता से ख़ुद को जुड़ा हुआ बताने में ज़्यादा इंटरेस्टेड था। 

    पाकिस्तान का सिंधु पर नया गेम समझिए
    असली कहानी ये है कि पाकिस्तान अब सिंधु घाटी सभ्यता और इस्लाम से पहले की विरासत का इस्तेमाल करके खुद को सिंधु नदी का वारिस बताना चाहता है. ताकि सिंधु नदी के पानी पर अपना दावा मज़बूत कर सके. अब वो मूअन-जो-दड़ो की बात कर रहा है, तक्षशिला को अपनी विरासत बता रहा है, गांधार उसको याद आ रहा है, बलूचिस्तान का मेहरगढ़ याद आ रहा है. अब तक इस्लाम से पहले का इतिहास उसको नज़र ही नहीं आता था. सरकार वहां डॉक्यूमेंट्रियां बनवा रही है, सेमिनार कर रही है और विदेशों में कार्यक्रम कर रही है कि सिंधु घाटी सभ्यता पाकिस्तान की पहचान का मुख्य हिस्सा है। 

    पाकिस्तान की पानी वाली पॉलिटिक्स समझिए
    तक्षशिला में टूरिज़्म करवाया जा रहा है, बड़ा म्यूज़ियम बनाने की बात हो रही है. गांधार की बौध विरासत और मेहरगढ़ को भी इसमें शामिल किया जा रहा है ताकि पाकिस्तान को हज़ारों साल पुरानी लगातार चली आ रही सभ्यता का वारिस बताया जा सके. अप्रैल में वहां के राष्ट्रपति आसिफ अली ज़रदारी ने विश्व धरोहर दिवस पर तो ये तक कह दिया कि पाकिस्तान सिंधु घाटी, मेहरगढ़ और गांधार सभ्यताओं का चौराहा है. हालांकि इस पर अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति हामिद करज़ई ने तीखा जवाब दिया कि गांधार का मुख्य इलाक़ा अफगानिस्तान में है और कोई एक देश इस विरासत का पूरा मालिक नहीं बन सकता. हाल ही में पाकिस्तान में ऑस्ट्रेलिया के हाई कमिश्नर टिमथी केन तक्षशिला गए और कहा कि ये जगह ज्ञान का केंद्र थी जो इस पूरे इलाके को जोड़ती थी. तो पाकिस्तान के एक विश्लेषक हैं अकबर अली शाह, उन्होंने जवाब में लिखा कि सिंधु पाकिस्तान की है और उसका इतिहास भी पाकिस्तान का है. तो ये सब जो सिंधु नदी के लिए प्यार उमड़ रहा है और अपने आप को सिंधु नदी का वारिस बताने की कोशिश हो रही है ये सिंधु जल समझौता रोके जाने के बाद ही क्यों हुई क्या किसीको समझ नहीं आता? बहुत अच्छी बात है अगर आप अपनी पहचान इस्लाम से पहले से जोड़ने की कोशिश कर रहे हो. क्योंकि जब यूनानी इस इलाक़े में आए तो सिंधु को उन्होंने इंडस बोला। 

    पाकिस्तान किस मुंह से उस सभ्यता का वारिस?
    और इंडस के लोगों को बोला इंडो. और ये इलाक़ा हुआ इंडिया. फिर जब फ़ारस के लोग आए तो फ़ारसी में ‘स’ का ‘ह’ हो जाता है. इसलिए सात दिनों का जो यहां सप्ताह था, उसको उन्होंने बोला हफ़्ता. और जैसे सप्ताह का हफ़्ता हो गया, वैसे ही सिंध का हिंद हो गया और सिंधु नदी के लोग कहलाए गए हिंदू. तो बहुत अच्छी बात है कि पाकिस्तान कह रहा है कि वो सिंधु घाटी सभ्यता का वारिस है. क्योंकि इंडस का वरिस तो इंडिया है, सिंधु का वारिस तो हिंद है. टू-नेशन थ्योरी की धज्जियां तो उड़ ही चुकी थीं 1971 में, उसको दफ़्न करने के लिए थैंक यू. बता देना आसिम मुनीर को भी. और सिधु घाटी सभ्यता की बात करते हो तो पता है आपको इतनी सारी खुदाई के बाद भी वहां सब कुछ मिला, एक भी हथियार नहीं निकला है खुदाई में. तो किस मुंह से ख़ुद को उस सभ्यता का वारिस बताते हो? तो ये मत समझना कि ये सब लारे-लप्पे लगाकर पानी मिल जाएगा. याद है वो समझौता क्यों रोका गया था? आतंक और पानी एक साथ नहीं बह सकते. सौ बात की एक बात। 

    पाकिस्तान का सिंधु पर यूटर्न
    वो तो इस्लाम आने से पहले भारत का जो इतिहास था उससे अपने आपको जोड़ कर ही नहीं देखना चाहता था. तो मूअन-जो-दड़ो में उसने 1965 में खुदाई रुकवा दी थी. जबकी भारत में तो गुजरात और राजस्थान में सिंधु घाटी सभ्यता की जगहों पर खोज चलती रही थी. लेकिन पिछले साल भारत ने सिंधु जल समझौते पर रोक लगाई तो पाकिस्तान ने मूअन-जो-दड़ो में फिर से खुदाई शुरू करवा दी. अब बिलावल भुट्टो-ज़रदारी भी कहते हैं कि वो तो सिंधु घाटी सभ्यता के वारिस हैं. अब वो ख़ुद को सिंधु के सच्चे रखवाले बता रहे हैं. अब तक तो आसिम मुनीर टू-नेशन थ्योरी के गाने गा रहे थे. अब इस्लाम से पहले का इतिहास याद आने लग गया है पाकिस्तान को। 

    बाढ़ भी नहीं सुलझा सकती यह समस्या
        सरकारी सर्वेक्षण के अनुसार मई 2022 में टरबेला की लाइव स्टोरेज 5.827 MAF थी, जो मार्च 2026 तक घटकर 5.580 MAF रह गई. रिपोर्ट में कहा गया है कि 2025 के दौरान इसमें सबसे तेज गिरावट दर्ज की गई. अधिकारियों का मानना है कि असामान्य रूप से अधिक तलछट आने के कारण यह स्थिति बनी है। 

        टरबेला डैम पाकिस्तान की बिजली उत्पादन क्षमता और सूखा प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभाता है. ऐसे में इसकी घटती क्षमता भविष्य में पाकिस्तान के लिए गंभीर संकट पैदा कर सकती है. विशेषज्ञों का मानना है कि बाढ़ अतिरिक्त पानी तो दे सकती है, लेकिन जलाशयों में जमा हो रही तलछट की समस्या का समाधान नहीं कर सकती। 

    खाद्य सुरक्षा पर भी मंडरा रहा खतरा
    सिंधु बेसिन सिंचाई सिस्टम पाकिस्तान की लगभग 90 फीसदी कृषि उत्पादन जरूरतों को पूरा करती है. ऐसे में सिंधु नदी प्रणाली में किसी भी तरह का बदलाव सीधे खाद्य सुरक्षा को प्रभावित करता है. अगर टरबेला और अन्य जलाशयों की क्षमता लगातार घटती रही, तो भविष्य में पाकिस्तान को कृषि उत्पादन और जल वितरण दोनों मोर्चों पर चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। 

    फिलहाल 2025 का संकट टल गया था, लेकिन पाकिस्तान की नई जल मूल्यांकन रिपोर्ट साफ संकेत देती है कि असली चुनौती अभी खत्म नहीं हुई है. भारत के फैसले, बदलते मौसम और जलाशयों की घटती क्षमता के बीच पाकिस्तान की जल सुरक्षा आने वाले वर्षों में बड़ी परीक्षा से गुजर सकती है। 

     

    News Desk

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