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    देश में हर 5वां व्यक्ति हाई BP का शिकार, AIIMS डॉक्टर बोले- सिर्फ 2 पॉइंट कम होने से टल सकता है हार्ट अटैक

    News DeskBy News DeskMay 30, 2026No Comments7 Mins Read
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    देश में हर 5वां व्यक्ति हाई BP का शिकार, AIIMS डॉक्टर बोले- सिर्फ 2 पॉइंट कम होने से टल सकता है हार्ट अटैक
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    नई दिल्ली
     भारत का हर पांचवां वयस्क उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) से पीड़ित है। शहरी क्षेत्र के हर तीसरे और ग्रामीण क्षेत्र के हर चौथे व्यक्ति को हाई बीपी है। देश में यह तेजी से बड़े स्वास्थ्य संकट के रूप में उभर रहा है।

    यही वजह है कि यह तेजी से बढ़ती गैर-संचारी (संक्रामक) बीमारियों में शामिल है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-पांच (एनएफएचएस-पांच) के अनुसार देश में 15 वर्ष से अधिक आयु की लगभग 24 प्रतिशत पुरुष और 21 प्रतिशत महिलाएं उच्च रक्तचाप से प्रभावित हैं।

    यह भी सामने आया है कि बड़ी संख्या में लोगों को अपने उच्च रक्तचाप की जानकारी तक नहीं होती। दिल्ली जैसे महानगरों में बदलती जीवनशैली, तनाव, अधिक नमक व जंक फूड का सेवन, शारीरिक गतिविधि में कमी और मोटापा इसके प्रमुख कारण हैं।

    40 साल से अधिक उम्र के पुरुषों का खतरा अधिक
    दिल्ली पर आधारित हालिया अध्ययन में बड़ी संख्या में लोगों में प्री-हाइपरटेंशन और उच्च रक्तचाप के मामले सामने आए हैं, विशेष रूप से 40 वर्ष से अधिक आयु के लोगों और पुरुषों में इसका खतरा अधिक पाया गया।

    एम्स के हृदय रोग विशेषज्ञ  डाॅ. ने बताया कि हर साल लाखों लोगों की जान लेने वाली यह बीमारी अधिकांशत: बिना किसी स्पष्ट लक्षण के शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचाती रहती है और ज्यादातर पीड़ित इससे अनजान रहते हैं।

    डाॅ.  के अनुसार भारत में 30 करोड़ से अधिक वयस्क हाई बीपी से पीड़ित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में हर चौथा और शहरी क्षेत्रों में हर तीसरा व्यक्ति हाई पीबी से प्रभावित है। हर साल करीब 16 लाख लोगों की जान इसके कारण जाती है। यह टीबी से होने वाली मौत से कई गुना अधिक है।

    डाॅके अनुसार यदि लोगों का ब्लड प्रेशर औसतन सिर्फ दो अंक भी कम हो जाए, तो हर साल एक लाख से 1.6 लाख तक मौतों को रोका जा सकता है।

    यदि किसी व्यक्ति का ब्लड प्रेशर 140 से घटकर 138 हो जाए, तो इसे दो अंक (ब्लड प्रेशर नापने वाली इकाई एमएमएचजी) की कमी माना जाएगा। ऐसा होने पर देश में हार्ट अटैक, स्ट्रोक और किडनी की बीमारी के मामलों में बड़ी गिरावट आ सकती है।

    दिल, दिमाग और किडनी पर भारी पड़ रहा हाई ब्लड प्रेशर
    अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता सामंथा ओ'कोनेल के मुताबिक, सबसे चिंताजनक बात यह है कि लोगों में बीमारी के प्रति जागरूकता, इलाज और नियंत्रण, तीनों ही बेहद कमजोर हैं। यह समस्या केवल गरीब देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि विकसित देशों में भी स्थिति संतोषजनक नहीं है।

    आज हाइपरटेंशन हार्ट अटैक, स्ट्रोक, किडनी फेलियर और डिमेंशिया (भूलने की बीमारी) का सबसे बड़ा कारण है। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ज्यादातर मामलों में इसके शुरुआती लक्षण दिखाई नहीं देते। इंसान अंदर ही अंदर बीमार होता रहता है और उसे पता तब चलता है जब पानी सिर से ऊपर गुजर जाता है।

    यहां तक कि जांच के बाद भी इसे नियंत्रित करना आसान नहीं होता। कई बार डॉक्टर इलाज से जुड़े नवीनतम दिशानिर्देशों का पालन नहीं कर पाते, जबकि मरीज नियमित रूप से दवाएं लेने और लंबे समय तक जीवनशैली में बदलाव बनाए रखने में संघर्ष करते हैं।

    अध्ययन में एक और चिंताजनक पहलु यह सामने आया है कि 2020 में दुनिया भर में हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित 20 फीसदी से भी कम लोगों का रक्तचाप नियंत्रित था। अमीर देशों में नियंत्रण की दर 40.2 फीसदी रही, जबकि निम्न और मध्यम आय वाले देशों में स्थिति कहीं ज्यादा बदतर है, जहां महज 13.6 फीसदी मरीज ही इसे कंट्रोल कर पा रहे हैं।

    अध्ययन की वरिष्ठ शोधकर्ता कैथरीन मिल्स का कहना है भले ही इस दिशा में कुछ प्रगति हुई हो, लेकिन वैश्विक स्तर पर रक्तचाप पर अभी भी बेहद कम नियंत्रण है। विडम्बना यह है कि प्रभावी दवाएं और इलाज मौजूद होने के बावजूद दुनिया इस बीमारी को काबू में नहीं कर पा रही।

    एशिया और अफ्रीका सबसे ज्यादा प्रभावित
    119 देशों के 60 लाख से ज्यादा वयस्कों के आंकड़ों पर आधारित यह अध्ययन अब तक के सबसे व्यापक विश्लेषणों में से एक माना जा रहा है। नतीजे दर्शाते हैं कि 2020 तक दक्षिण अमेरिका, कैरिबियन और उप-सहारा अफ्रीका में हाइपरटेंशन की दर सबसे अधिक थी। वहीं कुल मरीजों की संख्या के लिहाज से पूर्वी एशिया और प्रशांत क्षेत्र पहले स्थान पर रहे, जबकि दक्षिण एशिया दूसरे स्थान पर रहा।

    शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि कमजोर और समृद्ध देशों के बीच असमानता लगातार बढ़ रही है। 2000 में अनियंत्रित हाई ब्लड प्रेशर वाले 70 फीसदी लोग निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रह रहे थे, जो 2020 तक बढ़कर 83 फीसदी हो गए हैं।

    उच्च रक्तचाप से जूझ रहे हैं भारत में 30 फीसदी से ज्यादा वयस्क
    विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा जारी रिपोर्ट 'ग्लोबल रिपोर्ट ऑन हाइपरटेंशन 2025' से पता चला है कि भारत में 21 करोड़ से ज्यादा वयस्क उच्च रक्तचाप से पीड़ित हैं। मतलब की देश की 30 फीसदी से ज्यादा वयस्क आबादी इस समस्या से जूझ रही है।

    इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि इनमें से महज 39 फीसदी (8.22 करोड़) ही जानते हैं कि वो इस समस्या से पीड़ित हैं, जबकि करीब 83 फीसदी मरीजों यानी 17.3 करोड़ से ज्यादा का रक्तचाप नियंत्रित नहीं है। मतलब कि देश में हाई ब्लड प्रेशर के 17 फीसदी मरीजों में ही रक्तचाप नियंत्रित है।

    भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने इसपर किए अध्ययन में खुलासा किया है कि देश में करीब 34 फीसदी लोग प्री-हाइपरटेंशन का शिकार हैं। वहीं यदि देश में जिलों के आधार पर देखें तो यह आंकड़ा 15.6 फीसदी से 63.4 फीसदी दर्ज किया गया है।

    सच कहें तो देश में जिस तरह से खानपान की गुणवत्ता में गिरावट आ रही है और जीवनशैली बदल रही है, उसके चलते स्वास्थ्य से जुड़ी अनगिनत समस्याएं पैदा हो रही हैं, ऊपर से तनाव यह सभी मिलकर भारतीयों को अंदर ही अंदर घुन की तरह खाए जा रहे हैं।

    कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था पर बढ़ता आर्थिक बोझ
    विशेषज्ञों के मुताबिक हाई ब्लड प्रेशर अब महज स्वास्थ्य से जुड़ा संकट नहीं रहा, बल्कि यह आर्थिक चुनौती भी बनता जा रहा है।

    कमजोर देशों में स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को पहले ही संक्रामक रोगों, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य जैसी समस्याओं से जूझना पड़ रहा है। ऐसे में लंबे समय तक चलने वाली बीमारियों की देखभाल के लिए संसाधन जुटाना और कठिन हो जाता है।

    प्रोफेसर मिल्स का कहना है, "यह सिर्फ मरीज की लापरवाही का मामला नहीं है। मरीज के स्तर पर दवा समय से खाना और खान-पान बदलना तो चुनौती है ही, डॉक्टरों और हमारी स्वास्थ्य व्यवस्था के स्तर पर भी बड़ी खामियां हैं।"

    ऐसे में शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी है कि इस संकट से निपटने के लिए सस्ती दवाओं की उपलब्धता बढ़ाने, सही तरीके से रक्तचाप मापने, इलाज को सरल बनाने और ऐसी स्वास्थ्य व्यवस्था विकसित करने की जरूरत है, जो मरीजों को लंबे समय तक सहयोग दे सके।

    विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मरीज, डॉक्टर और पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था, तीनों स्तरों की बाधाओं को एक साथ दूर नहीं किया जाएगा, तब तक इस ‘साइलेंट किलर’ पर काबू पाना मुश्किल रहेगा।

    त्रिपुरा माॅडल बना उदाहरण
     डाॅ ने बताया कि 2017 में त्रिपुरा सरकार ने एम्स, भारतीय जन स्वास्थ्य प्रतिष्ठान और भारत में मधुमेह नियंत्रण परिषद (सीसीडीसी, काउंसिल फार कंट्रोल ऑफ डायबिटीज इन इंडिया) के सहयोग से एनसीडी इनिशिएटिव त्रिपुरा शुरू किया था।

    इस माॅडल में नर्स मरीज का ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और अन्य स्वास्थ्य जानकारी ‘एमपावर हार्ट मोबाइल एप’ में दर्ज करती है। एप उपचार, दवा आदि की सलाह देता है, जिससे डाॅक्टरों को उपचार में आसानी होती है और सीमित संसाधनों में ज्यादा लोगों तक उपचार पहुंच जाता है।

    एनएफएचएस-पांच के आंकड़ों के अनुसार

        केवल एक में से तीन लोगों को अपनी बीमारी की जानकारी मिल पाती है।
        पांच में से केवल एक मरीज को नियमित इलाज मिलता है।
        सिर्फ 12 में से एक व्यक्ति का ब्लड प्रेशर नियंत्रण में रह पाता है।
        दो अंक बीपी कम होने से बच सकती हैं लाखों जान।

     

    News Desk

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