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    हिमाचल में झील टूटने का खतरा, 34 बस्तियां और अटल टनल पर मंडराया संकट

    News DeskBy News DeskMay 28, 2026No Comments4 Mins Read
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    हिमाचल में झील टूटने का खतरा, 34 बस्तियां और अटल टनल पर मंडराया संकट
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     नई दिल्ली
    लाहौल-स्पीति के सिस्सू गांव में रहने वाले लोग अब शांतिपूर्ण पहाड़ी जीवन नहीं जी पा रहे हैं. अटल टनल खुलने के बाद यहां पर्यटकों की भारी भीड़ आ गई है, लेकिन गांव के ठीक ऊपर एक बड़ी समस्या पैदा हो रही है. 4,068 मीटर की ऊंचाई पर बनी घेपन झील हर साल बड़ा होती जा रही है. वैज्ञानिकों को डर है कि अगर यह झील फट गई तो सिस्सू गांव पर बहुत बड़ा खतरा आ सकता है. एकदम 2013 में केदारनाथ में आई आपदा की तरह। 

    सिस्सू गांव चंद्रा नदी के किनारे बसा है. अटल टनल से निकलते ही यह पहला बड़ा गांव है. कुछ साल पहले तक यहां शांति थी. लोग खेती और पशुपालन करते थे. लेकिन अक्टूबर 2020 में अटल टनल खुलने के बाद रोजाना हजारों गाड़ियां यहां से गुजरती हैं. पीक सीजन में 5000 गाड़ियां तक आती हैं। 

    DTE की रिपोर्ट के मुताबिक नदी किनारे अब बोटिंग, जिपलाइन, ऑफ-रोड वाहन और पर्यटक गतिविधियां चल रही हैं. गांव में होमस्टे और कैफे खुल गए हैं. लेकिन इस खूबसूरती के पीछे एक बड़ा खतरा छिपा है. गांव से करीब 11 किलोमीटर ऊपर हिमालय की घेपन झील (घेपांग घट) लगातार बढ़ रही है। 

    झील का आकार तेजी से बढ़ रहा है
    घेपन ग्लेशियर झील है. 1989 में इसका क्षेत्रफल सिर्फ 36.49 हेक्टेयर था. 2022 तक यह बढ़कर 101.30 हेक्टेयर हो गया है – यानी लगभग तीन गुना. वैज्ञानिकों के अनुसार, घेपन ग्लेशियर तेजी से पिघल रहा है. 1962 से अब तक ग्लेशियर 2.76 किलोमीटर पीछे हट चुका है. राष्ट्रीय रिमोट सेंसिंग सेंटर (NRSC) की रिपोर्ट में साफ चेतावनी दी गई है कि यह झील अतिसंवेदनशील है. अगर झील फटी तो सबसे पहले सिस्सू गांव पर असर पड़ेगा। 

    वैज्ञानिकों ने 8 अलग-अलग स्थितियों का अध्ययन किया है. सभी में सिस्सू गांव रेड जोन में आता है. सबसे खतरनाक स्थिति में झील फटने के सिर्फ 21 मिनट में बाढ़ का पानी सिस्सू पहुंच सकता है. पानी की रफ्तार 43 किलोमीटर प्रति घंटा तक हो सकती है. इस बाढ़ में सिर्फ पानी नहीं आएगा। 

    भारी मलबा, चट्टानें, पत्थर और ग्लेशियर के टुकड़े भी साथ आएंगे. इसकी चपेट में 34 बस्तियां, 204 हेक्टेयर खेती योग्य जमीन, 57 पुल और 106 किलोमीटर सड़कें आ सकती हैं. मनाली-लेह हाईवे, अटल टनल और पूरा पर्यटन इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो सकता है. बाढ़ का असर चिनाब नदी के रास्ते जम्मू-कश्मीर तक पहुंच सकता है। 

    ग्लेशियर पिघलने के कारण
    वैज्ञानिक भानु प्रताप और अनिल कुलकर्णी जैसे विशेषज्ञ बताते हैं कि हिमालय का तापमान तेजी से बढ़ रहा है. पहले ऊंचाई वाले इलाकों में बर्फ गिरती थी, अब बारिश हो रही है. बारिश बर्फ को बहुत तेजी से पिघलाती है.  1962 के बाद से घेपन ग्लेशियर हर साल औसतन 53 मीटर सिकुड़ रहा है. झील का बढ़ता पानी ग्लेशियर को और तेजी से पिघला रहा है. यह एक साइकिल बन गया है जो लगातार तेज होता जा रहा है। 

    राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने झील को अतिसंवेदनशील घोषित किया है. NRSC, केंद्रीय जल आयोग, NCPOR और CDAC जैसी संस्थाएं काम कर रही हैं. सिस्सू की कृत्रिम झील पर एक पायलट अलर्ट सिस्टम लगाया गया है, जिसमें सेंसर, कैमरा और सैटेलाइट आधारित चेतावनी व्यवस्था है. लेकिन यह टेस्टिंग फेज में है। 

    समस्या यह है कि गांव में अभी कोई पूरा अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, सायरन, चेतावनी बोर्ड या स्पष्ट निकासी रास्ते नहीं हैं. जमीनी स्तर पर तैयारी काफी कमजोर दिख रही है. घेपन झील अकेली नहीं है. हिमाचल प्रदेश में 2016 में 805 ग्लेशियर झीलें थीं, जो 2022 तक बढ़कर 1,619 हो गईं। 

    पूरे हिंदुकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर क्षेत्रफल तेजी से घट रहा है. जलवायु परिवर्तन के कारण नई-नई झीलें बन रही हैं, जो भविष्य में बड़े खतरे बन सकती हैं. घेपन झील सिस्सू गांव के लिए एक टाइम बम की तरह है. एक तरफ पर्यटन से हो रही कमाई, दूसरी तरफ बढ़ता पर्यावरणीय खतरा। 

    वैज्ञानिक चेतावनी दे रहे हैं कि ग्लेशियर पिघल रहे हैं और झीलें बढ़ रही है. स्थानीय लोगों को डर के साथ जीना पड़ रहा है. सरकार और वैज्ञानिकों को अब जल्दी से जल्दी अर्ली वॉर्निंग सिस्टम, निकासी योजनाएं और जागरूकता अभियान चलाने चाहिए। 

    सिस्सू की कहानी पूरे हिमालय के लिए चेतावनी है. जलवायु परिवर्तन अब दूर की समस्या नहीं रहा- यह हमारे पहाड़ों, गांवों और जिंदगियों को सीधे प्रभावित कर रहा है. अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए तो एक दिन यह खतरा हकीकत बन सकता है। 

    News Desk

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