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    Home»देश»केंद्र सरकार की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, TMC को लगा बड़ा झटका
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    केंद्र सरकार की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, TMC को लगा बड़ा झटका

    News DeskBy News DeskMay 2, 2026No Comments7 Mins Read
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    केंद्र सरकार की नियुक्ति पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, TMC को लगा बड़ा झटका
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    नई दिल्ली

    केंद्रीय कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर नियुक्त करने के चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची टीएमसी को अदालत से झटका लगा है. चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ पहुंची ममता बनर्जी की पार्टी से शीर्ष अदालत ने कहा कि हम चुनाव आयोग के फैसले के खिलाफ नहीं जाएंगे और इसपर कोई आदेश जारी नहीं करेंगे. कोर्ट ने साफ कहा कि ईसी को अपना अधिकारी चुनने का पूरा अधिकार है. शीर्ष अदालत ने कहा कि हम उनके काम में कोई दखल नहीं देंगे. बता दें कि टीएसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल पैरवी कर रहे थे. कोर्ट ने आगे कहा कि केंद्र सरकार के कर्मचारी के साथ एक राज्य सरकार के कर्मचारी की भी तैनाती की जाएगी। 

    पश्चिम बंगाल में 4 मई को होने वाली मतगणना से ठीक पहले सियासी माहौल और गरमा गया है। इस बीच सुप्रीम कोर्ट से तृणमूल कांग्रेस (TMC) को राहत नहीं मिली। अदालत ने उस याचिका पर कोई दखल देने से इनकार कर दिया, जिसमें Election Commission of India के फैसले को चुनौती दी गई थी। मामला मतगणना केंद्रों पर केंद्रीय सरकार और पीएसयू कर्मचारियों की तैनाती को लेकर था। टीएमसी चाहती थी कि इस व्यवस्था पर रोक लगे, लेकिन कोर्ट ने साफ कहा कि इसमें कुछ भी गलत नहीं है।

    कोर्ट का साफ संदेश, नियमों के खिलाफ नहीं
    सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि मतगणना में केंद्रीय कर्मचारियों की नियुक्ति नियमों के दायरे में आती है। बेंच ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में किसी नए आदेश की जरूरत नहीं है। यानी चुनाव आयोग का फैसला फिलहाल बरकरार रहेगा। कोर्ट ने आयोग के उस भरोसे को भी रिकॉर्ड में लिया, जिसमें कहा गया था कि जारी सर्कुलर को पूरी तरह लागू किया जाएगा।

    सिब्बल ने उठाए सवाल
    इससे पहले टीएमसी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने निर्वाचन आयोग की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि हमें उनसे न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है। 

    जब कपिल सिब्बल ने हर टेबल पर एक केंद्रीय कर्मचारी की अनिवार्यता पर सवाल उठाए, तो बेंच ने नियमों का हवाला देते हुए स्थिति स्पष्ट की. अदालत ने कहा, “आइए, हम इस प्रावधान को दोबारा पढ़ते हैं. यदि हम यह मान लें कि काउंटिंग सुपरवाइज़र और सहायक केंद्र सरकार के कर्मचारी होंगे, तो इसे गलत नहीं कहा जा सकता, क्योंकि प्रावधान में स्पष्ट है कि इनकी नियुक्ति राज्य या केंद्र, किसी भी पूल से की जा सकती है। 

    कोर्ट ने सिब्बल की दलीलों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “ऐसा नहीं है जैसा आप बता रहे हैं.” सिब्बल ने अदालत के सामने चार मुख्य मुद्दे उठाए:

    सूचना का अभाव: सिब्बल ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग बैठकें कर रहा है लेकिन उनके बारे में जानकारी साझा नहीं की जा रही है। 

    अतिरिक्त पर्यवेक्षक पर सवाल: उन्होंने कहा कि पहले से ही केंद्र सरकार का नामांकित माइक्रो ऑब्जर्वर मौजूद है, तो अब हर टेबल पर एक और केंद्रीय कर्मचारी की क्या आवश्यकता है?

    नियमों की अनदेखी: सिब्बल ने दलील दी कि सर्कुलर के अनुसार राज्य सरकार का नामांकित व्यक्ति होना चाहिए, लेकिन चुनाव आयोग अपनी मर्जी से नियुक्तियां कर रहा है। 

    क्या है पूरा विवाद?
    चुनाव आयोग ने 30 अप्रैल को एक निर्देश जारी किया था जिसके अनुसार मतगणना की हर टेबल पर सुपरवाइजर या असिस्टेंट में से कम से कम एक कर्मचारी केंद्र सरकार या पब्लिक सेक्टर (PSU) का होना अनिवार्य है. टीएमसी का आरोप है कि केंद्र सरकार के कर्मचारी बीजेपी के प्रभाव में काम कर सकते हैं, जबकि कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस आशंका को खारिज करते हुए आयोग के फैसले को वैध बताया था। 

    सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
    केंद्रीय कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर नियुक्त करने के फैसले के खिलाफ पहुंची टीएमसी को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी आदेश की जरूरत नहीं है. सर्कुलर का पूरी तरह से पालन होगा. इलेक्शन कमीशन को अधिकारी चुनने का हक है. चुनाव आयोग अपने कर्मचारी पर खुद नियंत्रण कर सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने इसके साथ इस मामले पर दखल देने से इनकार कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कर्मचारियों की तैनाती नियमों के खिलाफ नहीं है. चुनाव आयोग का सर्कुलर ही लागू होगा। 

    जस्टिस जे. बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि केवल एक ही पूल से चयन करना गलत नहीं कहा जा सकता. कपिल सिब्बल ने जवाब देते हुए कहा कि चयन राज्य सरकार और केंद्र सरकार के कर्मचारियों में से यादृच्छिक (रैंडम) तरीके से होना चाहिए. तब जस्टिस बागची ने कहा कि काउंटिंग सुपरवाइजर और काउंटिंग असिस्टेंट में से कम से कम एक केंद्र सरकार का कर्मचारी होना चाहिए. कपिल सिब्बल ने तब कहा कि तो फिर दूसरा राज्य सरकार का होना चाहिए, लेकिन यहां तो राज्य सरकार का कोई प्रतिनिधि नहीं है. सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि यहां एक और गलतफहमी यह है कि राज्य सरकार और केंद्र सरकार के कर्मचारी अलग‑अलग माने जा रहे हैं, जबकि वे सभी सरकारी कर्मचारी ही हैं। 

    वरिष्ठ अधिवक्ता डी.एस. नायडू ने कहा कि रिटर्निंग ऑफिसर के पास ओवरऑल अधिकार होते हैं और वह राज्य सरकार कैडर से होता है.प्रत्येक उम्मीदवार के पास अपना अलग काउंटिंग एजेंट भी होगा इसलिए इसको लेकर जताई जा रही आशंका पूरी तरह गलत और निराधार है. अदालत ने कहा कि किसी अतिरिक्त आदेश की आवश्यकता नहीं है, सिवाय इसके कि नायडू के बयान को दोहराते हुए 13 अप्रैल 2026 का सर्कुलर पूरी तरह लागू किया जाएगा। 

    'चुनाव आयोग को कहां से आशंका हो गई?'
    चुनाव आयोग के PSU कर्मचारियों को काउंटिंग सुपरवाइजर नियुक्त करने के फैसले के खिलाफ टीएमसी की ओर से कपिल सिब्बल ने ममता सरकार का पक्ष रखा. तृणमूल कांग्रेस के वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि ऐसी चीजें पहले नहीं हुईं. चुनाव आयोग को कहां से आशंका हो गई? कपिल सिब्बल ने कहा कि सर्कुलर में खुद ही कहा गया है कि राज्य सरकार के नोमिनी होने चाहिए,लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. सिब्बल ने कहा कि इस बात की आशंका है कि आयोग के इस कदम से चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित होगी.
    'डर है कि हर एक बूथ में दिक्कत होगी….'

    कपिल सिब्बल ने कहा कि यह सर्कुलर DEO को जारी किया गया है और हमें 29 अप्रैल को पता चला. इसके उलट, पहले से नोटिस दिया गया है.उनका कहना है कि उन्हें डर है कि हर एक बूथ में दिक्कत होगी. एक सेंट्रल गवर्नमेंट नॉमिनी है और अब उन्हें एक और चाहिए.सर्कुलर में कहा गया है कि स्टेट गवर्नमेंट नॉमिनी की जरूरत है लेकिन वे उसे अपॉइंट नहीं करेंगे. आर्टिकल 324 इस बारे में नहीं है कि आप जो चाहें और जैसा चाहें करें। 
     
    कलकत्ता हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ गई थी टीएमसी
    सुप्रीम कोर्ट में आज सुनवाई से पहले ममता बनर्जी की पार्टी कलकत्ता हाई कोर्ट में भी चुनाव आयोग के इस फैसले के खिलाफ पहुंची थी. वहां भी अदालत ने इसपर दखल देने से मना करते हुए कहा था कि अधिकारी केंद्रीय या राज्य सेवाओं, जिनमें PSU भी शामिल हैं, से कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं. जस्टिस कृष्णा राव की कोर्ट ने लागू हैंडबुक के प्रावधानों का हवाला देते हुए कहा था कि ऐसा कोई नियम नहीं है जो यह जरूरी करे कि चुनाव सिर्फ राज्य सरकार के कर्मचारियों में से ही किया जाए. कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस मामले को खारिज कर दिया था. कलकत्ता हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा था कि ऐसी नियुक्तियां पूरी तरह से चुनाव आयोग के अपने अधिकार क्षेत्र में आती हैं और इनमें कोई भी गैर-कानूनी बात या अधिकार क्षेत्र की कमी नहीं है. कोर्ट ने ये भी कहा था कि चुनाव आयोग को इसे तय करने का पूरा अधिकार है कि मतों की गणना के समय सेंटर पर कौन होगा।

    News Desk

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