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    ईरान ने फिर शुरू किया अंडरग्राउंड मिसाइलों का निर्माण, अमेरिका-इजरायल के दावों पर उठे सवाल

    News DeskBy News DeskSeptember 11, 2026No Comments4 Mins Read
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    ईरान ने फिर शुरू किया अंडरग्राउंड मिसाइलों का निर्माण, अमेरिका-इजरायल के दावों पर उठे सवाल
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    तेहरान 

    अमेरिका और मिडिल ईस्ट के खुफिया अधिकारियों के अनुसार ईरान ने बैलिस्टिक मिसाइलों का उत्पादन दोबारा शुरू कर दिया है. ये मिसाइलें युद्ध से पहले जमा किए गए यंत्रों को जोड़कर बनाई जा रही हैं. ये सारा काम अंडरग्राउंड फैसिलिटी में हो रहा है। 

    यह खबर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और इजरायल ने हालिया सैन्य अभियान के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमताओं को बड़ा नुकसान पहुंचाने का दावा किया था. अब वही क्षमता धीरे-धीरे वापस आती दिख रही है। 

    युद्ध के शुरुआती चरण में ईरान के मिसाइल लॉन्चपैड और औद्योगिक यूनिट्स पर भारी हमले हुए थे. इन हमलों का मकसद ईरान की मिसाइल निर्माण क्षमता को नष्ट करना था. लेकिन खुफिया जानकारी बताती है कि ईरान ने पहले से ही कई जरूरी पार्ट्स जमा कर रखे थे।

    अब इन्हीं स्टॉक किए गए पार्ट्स को भूमिगत जगहों पर ले जाकर मिसाइलें असेंबल की जा रही हैं. अंडरग्राउंड फैसिलिटी का इस्तेमाल इसलिए हो रहा है ताकि हवाई हमलों से बचा जा सके. काम बिना रुकावट चलता रहे। 

    ईरान दो तरह की बैलिस्टिक मिसाइलें बना रहा है. पहली लिक्विड-प्रोपेलेंट मिसाइलें, जिन्हें लॉन्च से ठीक पहले ईंधन भरना पड़ता है. दूसरी सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें, जिन्हें पहले से तैयार करके रखा जा सकता है और जरूरत पड़ने पर तुरंत दागा जा सकता है. सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें ज्यादा खतरनाक मानी जाती हैं क्योंकि इन्हें लंबे समय तक छिपाकर रखना आसान होता है. प्रतिक्रिया का समय बहुत कम हो जाता है। 

    अमेरिका और इजरायल के दावों पर सवाल
    अमेरिका और इजरायल ने युद्ध के दौरान ईरान की मिसाइल क्षमता को कमजोर करने को अपनी बड़ी उपलब्धि बताया था. उन्होंने दावा किया था कि कई उत्पादन स्थल नष्ट हो गए हैं और ईरान की मिसाइल स्टॉक में काफी कमी आई है. लेकिन अब खुफिया रिपोर्ट्स बता रही हैं कि उत्पादन फिर शुरू हो गया है. इससे उन दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं। 

    अगर ईरान अंडरग्राउंड फैसिलिटी में आसानी से मिसाइलें बना सकता है तो भविष्य में भी हवाई हमलों से पूरी क्षमता खत्म करना मुश्किल होगा. यह स्थिति क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए नई चुनौती पैदा कर रही है. मिडिल ईस्ट में तनाव पहले से ही ऊंचा है. ईरान की मिसाइल क्षमता बढ़ने से उसके पड़ोसी देशों और इजरायल के लिए खतरा बढ़ सकता है। 

    सॉलिड-प्रोपेलेंट मिसाइलें खासकर चिंता का विषय हैं क्योंकि इन्हें जल्दी तैनात किया जा सकता है. लिक्विड वाली मिसाइलों को ईंधन भरने में समय लगता है, इसलिए उनका पता लगाना और रोकना थोड़ा आसान होता है. लेकिन दोनों तरह की मिसाइलों का उत्पादन जारी रहना अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए परेशानी का सबब है। 

    अंडरग्राउंड प्रोडक्शन की रणनीति  
    ईरान लंबे समय से अपनी संवेदनशील सैन्य सुविधाओं को भूमिगत रखने की रणनीति अपनाता रहा है. पहाड़ी इलाकों और गहरे सुरंगों में फैक्ट्रियां बनाकर वह हवाई हमलों से बचाव करता है. युद्ध के बाद भी यही रणनीति काम आ रही है. स्टॉक किए गए पार्ट्स का इस्तेमाल करके वह नए उत्पादन प्लांट्स पर निर्भरता कम कर रहा है. इससे उत्पादन की रफ्तार तो धीमी हो सकती है, लेकिन रुक नहीं रही। 

    विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम दिखाता है कि आधुनिक युद्ध में किसी देश की सैन्य क्षमता को पूरी तरह नष्ट करना कितना मुश्किल है. एक बार स्टॉक जमा हो जाए और भूमिगत नेटवर्क मजबूत हो तो हमलों के बाद भी रिकवरी संभव हो जाती है। 

    अमेरिका और इजरायल के लिए अब नई चुनौती यह है कि वे कैसे इन भूमिगत स्थलों का पता लगाएं और उन्हें निशाना बनाएं. साथ ही राजनयिक दबाव और प्रतिबंधों के जरिए भी ईरान पर अंकुश लगाने की कोशिश जारी रह सकती है। 

    ईरान की मिसाइल क्षमता लौटने से पूरे मिडिल ईस्ट का सुरक्षा संतुलन प्रभावित हो सकता है. खाड़ी देश, इजरायल और अमेरिका सभी इस घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं. अगर उत्पादन की रफ्तार बढ़ी तो ईरान अपनी स्थिति मजबूत महसूस कर सकता है। 

    वहीं विरोधी पक्ष को अपनी रक्षा व्यवस्था और मजबूत करनी पड़ सकती है. यह मुद्दा सिर्फ सैन्य नहीं, बल्कि राजनयिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बनेगा. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को यह तय करना होगा कि ईरान की मिसाइल गतिविधियों पर कैसे नजर रखी जाए और आगे की कार्रवाई क्या हो। 

    कुल मिलाकर यह खबर साफ संकेत देती है कि युद्ध के बावजूद ईरान अपनी मिसाइल क्षमता को पूरी तरह खोने को तैयार नहीं है. अंडरग्राउंड फैसिलिटी और पहले से जमा पार्ट्स के सहारे वह धीरे-धीरे उत्पादन फिर शुरू कर चुका है. आने वाले समय में इस पर और खुफिया जानकारी सामने आएगी, लेकिन फिलहाल यह घटनाक्रम अमेरिका-इजरायल गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो रहा है। 

     

    News Desk

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