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    मनोरंजन

    CBFC कैसे देता है फिल्मों को सर्टिफिकेट, जानिए पूरी प्रक्रिया और नियम

    News DeskBy News DeskJuly 10, 2026No Comments5 Mins Read
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    CBFC कैसे देता है फिल्मों को सर्टिफिकेट, जानिए पूरी प्रक्रिया और नियम
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    इंडिया में सेंसर बोर्ड (CBFC) को लेकर सबके मन में कुछ सवाल घूमते रहते हैं- किस बेसिस पर ये फिल्मों को सर्टिफिकेट देते हैं? आखिर सेंसर बोर्ड फिल्म में इतने कट्स क्यों लगा देता है? क्यों किसी डायलॉग को यूं ही बदल दिया जाता है? सबसे महत्वपूर्ण सवाल- क्यों किसी फिल्म को सर्टिफिकेट देने से मना कर देते हैं? ये आखिरी सवाल इन दिनों काफी चर्चा में बना हुआ है.

    दिलजीत दोसांझ की फिल्म सतलुज, जो पहले पंजाब 95 थी उसे सेंसर बोर्ड ने पास नहीं किया था. वो इसमें करीब 120 कट्स लगाने की मांग कर रहे थे, जिसे मेकर्स ने नहीं स्वीकार किया. उन्होंने बिना सेंसर सर्टिफिकेट इसे सीधा ओटीटी पर चुपचाप रिलीज किया. इसके बाद से विवाद काफी ज्यादा बढ़ गया. दिलजीत की फिल्म के अलावा सेंसर बोर्ड में तमिलनाडु के सीएम थलपति विजय की फिल्म जन नायगन भी अटकी हुई थी, जिसे अब करीब 7 महीने बाद जाकर सेंसर बोर्ड से A सर्टिफिकेट मिला.

    विजय की जन नायगन के साथ भी कुछ मुद्दे थे जो सुलझ नहीं रहे थे. इसमें कुछ आपत्तिजनक सीन्स थे, जिससे कई लोगों की भावनाएं आहत हो सकती थी. इसलिए सर्टिफिकेट रोका गया था. अब थलपति तो सेंसर बोर्ड की परीक्षा में पास हो गए, मगर दिलजीत अभी तक अटके हुए हैं. अब किसी फिल्म को किस तरह सेंसर बोर्ड सर्टिफिकेट देती है, जान‍िए.

    कैसे काम करता है CBFC?
    CBFC का सदस्य राज मिश्रा ने एक इंटरव्यू में सेंसर बोर्ड की पूरी प्रक्रिया पर कहा- CBFC से सर्टिफिकेट लिए बिना किसी फिल्म को सार्वजनिक तौर पर दिखाना कानूनी अपराध है. ऐसा करने पर सजा हो सकती है. CBFC के चेयरमैन की नियुक्ति सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय करता है. फिलहाल प्रसून जोशी CBFC के चेयरमैन हैं. हर फिल्म को सर्टिफिकेट देने से पहले CBFC की 5 सदस्यों वाली एक कमेटी फिल्म देखती है. अगर इन 5 में से कम से कम 3 सदस्य फिल्म के पक्ष में फैसला देते हैं, तो फिल्म को सर्टिफिकेट जारी कर दिया जाता है.

    राज मिश्रा ने आगे तीन तरह के सर्टिफिकेट (A, U, U/A) की पूरी प्रक्रिया समझाई. उन्होंने बताया कि अगर कोई फिल्म पूरी तरह क्राइम और वॉइलेंस से भरी है, तो उसे A सर्टिफिकेट दिया जाता है जिसमें 18 साल से ऊपर के लोग ही वो फिल्म देख सकते हैं. वहीं अगर किसी फिल्म में थोड़ी बहुत मार-धाड़ और क्राइम है तो उसे U/A सर्टिफिकेट मिलता है जिसमें छोटे बच्चे भी माता-पिता की गाइडेंस में पिक्चर देख सकते हैं. U सर्टिफिकेट आमतौर पर उस फिल्म को दिया जाता है, जिसे हर उम्र का व्यक्ति देख सकता है. राज मिश्रा के मुताबिक, सर्टिफिकेट देने की प्रक्रिया सुरक्षा प्रावधान के कारण होती है.

    फिल्म पास नहीं हुई, तो क्या होता है?
    राज मिश्रा ने आगे ये भी बताया कि अगर कोई फिल्म पहली कमेटी की तरफ से पास नहीं होती है, तब फिल्ममेकर्स फिर से अपनी फिल्म को री-एग्जामिन करने की अर्जी डालते हैं. इसमें एक दूसरी कमेटी इसमें शामिल होती है जिसमें 11 सदस्य मौजूद रहते हैं. अगर इसमें भी फिल्म को सेंसर बोर्ड से सर्टिफिकेट नहीं मिलता है, तब मेकर्स दिल्ली में द ट्रिब्यूनल को अप्रोच करते हैं. हालांकि उनके मुताबिक, ऐसे बड़े कम केस ही हुए हैं.

    कैसे पास होती है पिक्चर?
    राज मिश्रा ने एक फिल्म को सेंसर बोर्ड से हरी झंडी मिलने की प्रक्रिया भी बताई. उन्होंने कहा- फिल्म की कहानी और उसे दिखाने का तरीका आज के दौर के हिसाब से होना चाहिए. समय के साथ नियम भी बदलते रहते हैं. आज हल्के-फुल्के वॉइलेंस को लोग आम तौर पर स्वीकार कर लेते हैं, लेकिन अगर किसी फिल्म में बहुत ही डरावने और खौफनाक हिंसक सीन हों, जैसे किसी का जबड़ा उखाड़ देना, तो हमें ये देखना पड़ता है कि ऐसे सीन्स दर्शकों पर बुरा असर ना डालें.

    'कोई भी फिल्म देश-विरोधी सोच को बढ़ावा नहीं देनी चाहिए और ना ही देश या उसकी नीतियों का अपमान करना चाहिए. फिल्म का मकसद सिर्फ एंटरटेन करना हो सकता है, लेकिन उसे लोगों को भड़काने या अशांति फैलाने के लिए प्रेरित नहीं करना चाहिए. फिल्म बनाने वालों को अपनी बात कहने की पूरी आजादी है, लेकिन इस आजादी की कुछ सीमाएं भी होती हैं.'

    राज मिश्रा से आगे एक और अहम सवाल पूछा गया कि क्या कभी सेंसर बोर्ड किसी नेता के बातों में आकर फिल्म के सर्टिफिकेशन में बदलाव करती है? तो इसपर उन्होंने सफाई देते हुए कहा- मैं अभी भी CBFC का सदस्य हूं. आज तक मुझे किसी भी फिल्म को लेकर किसी तरह का दबाव डालने वाला फोन नहीं आया है. हमें पहले से ये नहीं बताया जाता कि किस फिल्म की सेंसर स्क्रीनिंग करनी है या वो फिल्म किसकी है. ये जानकारी हमें स्क्रीनिंग के समय ही दी जाती है.

    'शायद हो सकता है किसी फिल्म को राजनीतिक समर्थन मिला हो, लेकिन उसकी जानकारी सेंसर बोर्ड तक नहीं पहुंचती. CBFC का काम सिर्फ ये देखना होता है कि फिल्म से किसी की भावनाएं एक तय सीमा से ज्यादा आहत ना हों. बोर्ड का काम इसी जिम्मेदारी तक सीमित रहता है.'

    बिना सेंसर सर्टिफिकेट क्या है फिल्म रिलीज करने की सजा?
    राज मिश्रा के मुताबिक, अगर कोई फिल्म बिना सेंसर से पास हुए रिलीज की जाती है, तो उसे कानूनी अपराध माना जाता है. दिलजीत की फिल्म सतलुज बिना सेंसर सर्टिफिकेट के रिलीज हुई. वैसे सिनेमैटोग्राफ अधिनियम, 1952 की धारा 7 के तहत ऐसा करना दंडनीय प्रावधान हैं जिसमें अपराधियों को तीन साल तक की कैद, भारी जुर्माना और फिल्म-स्क्रीनिंग से जुड़ी सभी चीजों को जब्त किए जाने का सामना करना पड़ सकता है. ये जुर्माना 1 लाख रुपये तक भी हो सकता है.

    देखा जाए तो दिलजीत की फिल्म सतलुज सीधा ओटीटी पर रिलीज हुई, जहां कोई सेंसरशिप नहीं है. ऐसे में क्या इस फिल्म के खिलाफ कोई एक्शन लिया जाएगा? ये देखने वाली बात होने वाली है.

    News Desk

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