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    Home»व्यापार»इंदिरा नूयी के बयान पर छिड़ी बहस, बोलीं- ‘भारत में रहती तो पेप्सिको की CEO नहीं बन पाती’, चीन की भी की तारीफ
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    इंदिरा नूयी के बयान पर छिड़ी बहस, बोलीं- ‘भारत में रहती तो पेप्सिको की CEO नहीं बन पाती’, चीन की भी की तारीफ

    News DeskBy News DeskJuly 3, 2026No Comments6 Mins Read
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    इंदिरा नूयी के बयान पर छिड़ी बहस, बोलीं- ‘भारत में रहती तो पेप्सिको की CEO नहीं बन पाती’, चीन की भी की तारीफ
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     कैलिफोर्निया

    पेप्सिको की पूर्व सीईओ इंदिरा नूयी ने भारत को लेकर बेहद तीखे बयान दिए हैं। भारतीय मूल की इंदिरा नूयी ने एक इंटरव्यू में चीन को भारत की तुलना ज्यादा सुविधाजनक बताया है। उन्होंने भारत की कार्यसंस्कृति और सामाजिक व्यवस्था की भी तीखी आलोचना की है। इंदिरा नूयी ने 'हूवर इंस्टिट्यूशन' के एक विशेष इंटरव्यू में लीडरशिप, अपने अमेरिकी सफर और भारत को लेकर कई बेबाक और दिलचस्प टिप्पणियां की हैं।
    भारत में होती तो इतनी बड़ी कंपनी की CEO नहीं बन पाती

    नूयी ने अमेरिका के 'मेरिटोक्रेटिक' यानी योग्यता आधारित सिस्टम की तारीफ करते हुए स्पष्ट रूप से कहा कि अगर वह अमेरिका नहीं आतीं, तो शायद इस मुकाम तक नहीं पहुंच पातीं। भारत की सामाजिक और कॉर्पोरेट व्यवस्था पर सबसे बड़ा सवाल उठाते हुए नूयी ने दावा किया कि उनके जैसी सफलता भारत में रहकर हासिल करना मुमकिन नहीं था। उन्होंने कहा, "एक अप्रवासी अपनी जेब में बिना कुछ लिए आता है और एक प्रतिष्ठित अमेरिकी कंपनी का CEO बन जाता है… ऐसा दुनिया के किसी और देश में नहीं हो सकता। मैं दुनिया के किसी भी अन्य देश में, यहां तक कि भारत में भी कभी सीईओ नहीं बन सकती थी।"
    चीन की तारीफ, भारत को बताया 'गंदा'

    एक यात्री के तौर पर चीन और भारत की तुलना करते हुए नूयी ने कहा कि चीन बहुत 'सजातीय' और व्यवस्थित है, जबकि भारत पूरी तरह से 'अराजक' है। उन्होंने कहा, "चीन में काफी हद तक एक जैसी संस्कृति और लोग हैं। एक पर्यटक के तौर पर भारत की तुलना में चीन में समय बिताना आसान है। अगर आपको साफ-सुथरी और व्यवस्थित जिंदगी पसंद है, तो भारत में रहना आपके लिए नामुमकिन होगा। भारत की खूबसूरती उसकी अव्यवस्था में ही है। अगर आपको यह अव्यवस्था पसंद आती है, तो आप बार-बार यहां आना चाहेंगे।" उन्होंने सड़क पर कारों के बीच चलती गायों का उदाहरण देते हुए कहा कि जो लोग सिर्फ साफ-सफाई और व्यवस्था पसंद करते हैं, उनके लिए भारत को समझना मुश्किल होगा, लेकिन भारतीय लोग इसी तरह की अव्यवस्था के बीच रास्ते निकालना जानते हैं।
    60 और 70 के दशक का भारत और महिलाओं की स्थिति

    अपने शुरुआती जीवन को याद करते हुए नूयी ने बताया कि औपनिवेशिक शासन के बाद का युवा भारत कैसा था। उनका जन्म भारत की आजादी के सात-आठ साल बाद हुआ था। उन्होंने बताया, "60 और 70 के दशक में भारत एक नया देश था और उस समय महिलाएं समाज में कोई बड़ी ताकत नहीं थीं। अधिकांश महिलाएं घर पर ही रहती थीं।" हालांकि, उन्होंने अपने परिवार का जिक्र करते हुए कहा कि उनके पिता और दादा ने उन्हें "दुनिया जीतने और बड़े सपने देखने" के लिए प्रेरित किया, जिसने उन्हें अमेरिका जाने का साहस दिया।
    भारतीय लोकतंत्र: धीमी प्रगति, लेकिन यही इसकी ताकत है

    नूयी ने चीन के सेंट्रलाइज्ड विकास मॉडल और भारतीय लोकतंत्र की तुलना करते हुए बेहद दिलचस्प विश्लेषण किया। उन्होंने माना कि चीन ने सेंट्रलाइज्ड व्यवस्था के कारण लाखों लोगों को गरीबी से निकाला और एक सुपरपावर बना। वहीं भारत को लेकर उन्होंने कहा, "भारत अभी भी एक विश्व शक्ति बनने के लिए संघर्ष कर रहा है क्योंकि वहां लोकतंत्र का शासन है और जब हर किसी के पास वोट और अपनी बात कहने का अधिकार होता है, तो प्रगति धीमी होती है।"

    हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें भारत के लोकतांत्रिक होने पर खुशी है क्योंकि सत्तावादी शासनों के पास 'सत्ता के शांतिपूर्ण हस्तांतरण' का कोई तंत्र नहीं होता है, जो उनका सबसे बड़ा नुकसान है। उन्होंने एक बेहतरीन उदाहरण देते हुए कहा कि अमेरिका की तरह भारत के हर छोटे-बड़े कस्बे में एक 'कोर्टहाउस' होता है, जो लोगों को यह भरोसा देता है कि उनके पास अधिकार हैं। चीन में ऐसा नहीं है क्योंकि वहां सरकार ही नियम बनाती और फैसला करती है।
    भारत-अमेरिका संबंध: स्वाभाविक भागीदार

    भारत और अमेरिका के रिश्तों को लेकर नूयी ने दोनों देशों को एक-दूसरे का 'नेचुरल पार्टनर' बताया। उन्होंने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जिसकी 50% से अधिक आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। इसके साथ ही यहां दुनिया की सबसे बड़ी अंग्रेजी बोलने वाली आबादी है। उनके अनुसार, सॉफ्टवेयर, इंजीनियरिंग और AI के क्षेत्र में भारतीय प्रतिभाएं दुनिया के भविष्य के लिए बेहद अहम होने जा रही हैं। दोनों देशों के संबंधों में उतार-चढ़ाव पर उन्होंने सलाह दी कि, "अमेरिका और भारत के नेताओं को कोई भी कड़ा कदम उठाने या ईगो में आने से पहले एक-दूसरे की जगह खुद को रखकर सोचना चाहिए।"

    भू-राजनीति और चीन के बढ़ते प्रभाव पर बात करते हुए नूयी ने भारत की सुरक्षा को अमेरिकी हितों के लिए जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि जब चीन के साथ जियो-पॉलिटिकल रेस की बात आती है, तो भारत एक धुरी बन जाता है। नूयी ने कहा, "यह देखते हुए कि भारत कितने 'खराब पड़ोस' में है, यह बेहद अहम है कि अमेरिका भारत की रक्षा करे और वहां लोकतंत्र को फलने-फूलने दे।
    कौन हैं इंदिरा नूयी?

    इंदिरा नूयी भारतीय मूल की एक बेहद प्रभावशाली अमेरिकी बिजनेस एग्जीक्यूटिव हैं। उन्हें मुख्य रूप से दुनिया की सबसे बड़ी फूड और बेवरेज कंपनियों में से एक, पेप्सिको की पूर्व सीईओ और चेयरपर्सन के रूप में उनके शानदार नेतृत्व के लिए जाना जाता है।

    शादी से पहले उनका नाम इंदिरा कृष्णमूर्ति था। उनका जन्म 28 अक्टूबर 1955 को तमिलनाडु के मद्रास (अब चेन्नई) में हुआ था। उन्होंने 1975 में मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज से फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स में ग्रेजुएशन किया। इसके बाद 1976 में भारत के प्रतिष्ठित IIM कलकत्ता से पोस्ट ग्रेजुएट प्रोग्राम (MBA) पूरा किया।

    1978 में वह उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका चली गईं। 1980 में उन्होंने प्रतिष्ठित Yale School of Management से पब्लिक और प्राइवेट मैनेजमेंट में मास्टर डिग्री हासिल की। अपने शुरुआती दिनों में पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए उन्होंने रिसेप्शनिस्ट के तौर पर भी नाइट शिफ्ट में काम किया था।

    येल से पढ़ाई के बाद उन्होंने बोस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (BCG), मोटोरोला और आसिया ब्राउन बोवेरी (ABB) जैसी दिग्गज कंपनियों में काम किया। उन्होंने रणनीतिक योजना के प्रमुख के रूप में 1994 में पेप्सिको जॉइन किया और कंपनी की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाई। 2006 में उन्हें पेप्सिको का CEO और 2007 में चेयरपर्सन बनाया गया। वह पेप्सिको के 42 साल के इतिहास में इस पद तक पहुंचने वाली पहली महिला थीं।

    News Desk

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