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    एक तरफ खामेनेई के जनाजे की चर्चा, दूसरी ओर अमेरिका के Independence Day की तैयारी, 4 जुलाई पर दुनिया की नजर

    News DeskBy News DeskJune 30, 2026No Comments6 Mins Read
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    एक तरफ खामेनेई के जनाजे की चर्चा, दूसरी ओर अमेरिका के Independence Day की तैयारी, 4 जुलाई पर दुनिया की नजर
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    तेहरान 
    जुलाई की शुरुआत में दुनियाभर में बड़ी हलचल देखी जा सकती है. अमेरिका एक तरफ जहां बड़े जोर-शोर से चार जुलाई को अपना स्वतंत्रता दिवस मना रहा होगा. वहीं, ईरान अपने सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई को अंतिम विदाई दे रहा होगा. इन दोनों ही घटनाओं पर दुनियाभर की नजरें होंगी। 

    चार जुलाई को अमेरिका की आजादी की 250वीं वर्षगांठ होगी. ऐसे में अमेरिका में हफ्तेभर तक कार्यक्रम किए जाएंगे. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि वह चार जुलाई को नेशनल मॉल में होने वाले दुनिया के सबसे शानदार आयोजन को संबोधित करेंगे। 

    वहीं, ईरान तीन से पांच जुलाई तक आयुतल्लाह अली खामेनई को अंतिम विदाई दे रहा है. उनके जनाजे में करोड़ों लोगों के शामिल होने की उम्मीद जताई जा रही है. अगर ऐसा होता है तो यह दुनिया का अब तक का सबसे बड़ा जनसैलाब होगा. इससे पहले 1989 में ईरान के पहले सर्वोच्च नेता रुहोल्लाह खुमैनी के जनाजे में तकरीबन एक करोड़ लोग जुटे थे. उनके उत्तराधिकारी अली खामेनेई पश्चिम एशिया के सबसे लंबे समय तक सत्ता में रहने वाले प्रमुख थे. इस साल 28 फरवरी को इजरायल और अमेरिका के संयुक्त हवाई हमलों में उनकी हत्या कर दी गई थी। 

    अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर 13,000 से अधिक हवाई हमले किए, जिसके कारण आयतुल्लाह को अंतिम विदाई देना बेहद जोखिम भरा हो गया था. हालांकि आठ अप्रैल से अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी युद्धविराम लागू है. इसके बाद 17 जून को राष्ट्रपति ट्रंप और उनके ईरानी समकक्ष मसूद पेजेश्कियान ने युद्ध समाप्त करने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर साइन किए. दोनों देशों के बीच स्थायी शांति के लिए बातचीत जारी है। 

    बता दें कि ईरान ने अंतिम संस्कार के लिए तीन, चार और पांच जुलाई की तारीखें यूं ही नहीं चुनी हैं. इतिहास बताता है कि ईरान अक्सर अमेरिका को संदेश देने के लिए प्रतीकात्मक तारीखों का इस्तेमाल करता रहा है. चार नवंबर 1979 को ईरानी छात्रों ने ईरान स्थित अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर 66 अमेरिकी नागरिकों को बंधक बना लिया था. 444 दिनों तक चला यह संकट 20 जनवरी 1981 को खत्म हुआ था. लेकिन इसके ठीक उसी दिन जब तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर व्हाइट हाउस छोड़ रहे थे. कार्टर ने बंधकों को छुड़ाने की पूरी कोशिश की. अप्रैल 1980 में उन्होंने एक सैन्य बचाव अभियान भी शुरू किया, लेकिन ईरानी रेगिस्तान में एक अमेरिकी हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस हो गया, जिसमें पांच अमेरिकी सैनिक मारे गए और ये मिशन फेल  हो गया। 

    इस बंधक संकट ने कार्टर की राष्ट्रपति पद की छवि को बुरी तरह नुकसान पहुंचाया. उनकी दोबारा चुनाव जीतने की उम्मीद खत्म हो गई और रोनाल्ड रीगन के सत्ता में आने का रास्ता साफ हो गया. बंधकों की रिहाई के लिए वही तारीख चुनना ईरान का कार्टर को आखिरी राजनीतिक झटका देना था, ताकि जीत का श्रेय उन्हें न मिल सके। 

    45 साल भी अमेरिका-ईरान आमने-सामने
    ट्रंप के नेतृत्व में चला पांच सप्ताह का युद्ध ईरान को काफी कमजोर जरूर कर गया, लेकिन अमेरिका अपने अमेरिका अपना प्रमुख लक्ष्य हासिल नहीं कर सका. ना तो ईरान में सत्ता परिवर्तन हुआ, ना उसने उच्च संवर्धित यूरेनियम छोड़ा, ना परमाणु कार्यक्रम समाप्त किया, ना क्षेत्रीय सहयोगी संगठनों का समर्थन खत्म किया और ना ही अपनी बैलिस्टिक मिसाइल परियोजना छोड़ी. इसे विपरीत, ईरान ने होर्मुज को अवरुद्ध कर दिया, जहां से दुनिया की लगभग 25 फीसदी तेल की सप्लाई होती है। 

    ईरान की बात करें तो यहां सत्ता पर कट्टरपंथी इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स काउंसिल (IRGC) का प्रभाव और मजबूत हो गया है. उनके लिए खामेनेई की अंतिम विदाई दुनिया को कई संदेश देने का अवसर है. अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि खामेनेई को उनके पैतृक शहर मशहद में दफनाया जाएगा या फिर तेहरान स्थित करीब दो अरब डॉलर की लागत से बने रुहोल्लाह खुमैनी मकबरे में लेकिन यह तय माना जा रहा है कि पूरा आयोजन राजनीतिक संदेश देने के उद्देश्य से किया जाएगा। 

    ईरान पर हमला 21वीं सदी के सबसे भीषण बमबारी ऑपरेशन में से एक रहा. लेकिन इसके बावजूद ईरानी शासन कायम है. उसने अरबों डॉलर की सैन्य और बुनियादी ढांचे की क्षति उठाई, कई युद्धपोत और विमान गंवाए लेकिन दुनिया की सबसे ताकतवर सैन्य शक्ति को निर्णायक जीत हासिल नहीं करने दी। 

    लाखों-करोड़ों लोगों की भीड़ किसी भी सरकार के लिए वैधता और जनसमर्थन का प्रतीक होती है. इसे ट्रंप से बेहतर शायद ही कोई समझता हो. 2017 में उन्होंने मीडिया की उस रिपोर्टिंग की आलोचना की थी, जिसमें कहा गया था कि उनके शपथ ग्रहण समारोह में बराक ओबामा के 2009 के समारोह से कम भीड़ आई थी। 

    ईरानी शासन ने 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद सबसे बड़े जनआंदोलनों का सामना किय.। पहले 2017 में महसा अमीनी आंदोलन और फिर दिसंबर 2025 में आर्थिक संकट के खिलाफ बड़े विरोध प्रदर्शन हुए. दोनों आंदोलनों को सरकार ने कठोर बल प्रयोग के जरिए दबा दिया लेकिन जब अमेरिका और ईरान के ये दोनों बड़े आयोजन समाप्त हो जाएंगे, तब भी ईरान का सवाल ट्रंप के सामने सबसे बड़ी चुनौती बना रहेगा। 

    जिस ईरान को रोनाल्ड रीगन पूरी तरह नहीं संभाल पाए, वही चुनौती आज ट्रंप के सामने है. बता दें कि ट्रंप, रोनाल्ड रीगन को अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ अमेरिकी राष्ट्रपति बताते हैं. रीगन शीत युद्ध के अंत से लेकर सोवियत संघ के विघटन जैसे ऐतिहासिक घटनाओं के साक्षी रहे लेकिन ईरान उनके लिए भी कठिन साबित हुआ. उन्होंने सार्वजनिक रूप से कार्टर सरकार द्वारा लगाए गए हथियार प्रतिबंध को जारी रखा, लेकिन उनकी सरकार ने गुप्त रूप से ईरान को हथियार भी बेचे। 

    यही मामला आगे चलकर ईरान-कॉन्ट्रा के नाम से मशहूर हुआ, जिसने 1981 से 1986 के बीच उनकी सरकार को गहरे संकट में डाल दिया. मार्च 1987 में रीगन ने राष्ट्र के नाम संबोधन में इस मामले की पूरी जिम्मेदारी लेते हुए कहा था कि जो शुरुआत ईरान के साथ रणनीतिक संवाद के रूप में हुई थी, वह आखिरकार बंधकों के बदले हथियारों के सौदे में बदल गई. हालांकि, रीगन पर महाभियोग नहीं चला और उनकी लोकप्रियता फिर बढ़ गई। 

    अमेरिकी अर्थव्यवस्था अब भी बढ़ रही है, लेकिन महंगाई चिंता का विषय बनी हुई है. दूसरी ओर ट्रंप की लोकप्रियता 37 से 41 फीसदी के बीच बनी हुई है, जो किसी दूसरे कार्यकाल वाले अमेरिकी राष्ट्रपति के लिए सबसे कम स्तरों में गिनी जाती है. उनके सामने अब सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव हैं. अगर डेमोक्रेटिक पार्टी संसद के दोनों सदनों में बहुमत हासिल कर लेती है, तो ट्रंप के अगले दो साल काफी मुश्किल हो सकते हैं. यही चुनाव तय करेंगे कि उनके दूसरे कार्यकाल की दिशा क्या होगी। 

    News Desk

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