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    Home»मनोरंजन»अभिनेता रोहित रॉय के टीवी को ‘डस्टबिन मीडियम’ बताने वाले बयान पर छिड़ी बहस
    मनोरंजन

    अभिनेता रोहित रॉय के टीवी को ‘डस्टबिन मीडियम’ बताने वाले बयान पर छिड़ी बहस

    News DeskBy News DeskSeptember 15, 2026No Comments4 Mins Read
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    अभिनेता रोहित रॉय के टीवी को ‘डस्टबिन मीडियम’ बताने वाले बयान पर छिड़ी बहस
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    टीवी को लेकर एक्टर रोहित रॉय का ‘डस्टबिन मीडियम’ वाला बयान इन दिनों खूब चर्चा में है. रोहित ने कहा कि टीवी पर बनाया गया कंटेंट अक्सर ऐसा होता है जिसे आज देखा और कल भुला दिया जाता है. उनके मुताबिक टीवी में अब पहले जैसी क्रिएटिविटी नहीं बची है और फिल्म कलाकारों की तुलना में टीवी कलाकारों में भी वह ‘ग्रेस’ और ‘क्लास’ नजर नहीं आती.

    बयान पर विवाद होना लाजमी है, लेकिन क्या रोहित की पूरी बात को खारिज कर देना चाहिए? शायद नहीं. क्योंकि उनके बयान में एक चुभता हुआ सवाल जरूर छिपा है- क्या आज का टीवी अपने शानदार इतिहास से दूर चला गया है?

    टीवी की शुरुआत ही ‘मसाले’ से नहीं, मकसद से हुई थी
    भारतीय टेलीविजन के इतिहास को देखें तो शुरुआत बेहद मजबूत थी. 7 जुलाई 1984 को दूरदर्शन पर ‘हम लोग’ आया, जिसे भारत का पहला लंबा चलने वाला हिंदी सोप ओपेरा माना जाता है. इसकी कहानी किसी महल या करोड़पति परिवार की नहीं, बल्कि एक आम मिडिल क्लास परिवार के संघर्ष, सपनों और रिश्तों की थी.

    ‘हम लोग’ सिर्फ मनोरंजन नहीं था. इसमें परिवार, शराब की लत, महिलाओं की स्थिति, रोजगार और सामाजिक बदलाव जैसे मुद्दे कहानी के साथ बुने गए थे. हर एपिसोड के बाद अशोक कुमार दर्शकों से सीधे संवाद करते थे. टीवी उस दौर में कहानी भी सुनाता था और समाज से बात भी करता था.

    इसके बाद आया ‘बुनियाद’. 1986 में रमेश सिप्पी के निर्देशन में शुरू हुए इस शो ने विभाजन की त्रासदी और उसके बाद की पीढ़ियों की कहानी को परिवार के जरिए दिखाया. इसकी भाषा जमीन से जुड़ी थी और किरदार सिर्फ अच्छे-बुरे के खांचे में नहीं बंटे थे. यही वजह थी कि ‘बुनियाद’ को आज भी भारतीय टीवी के सुनहरे दौर की मिसाल माना जाता है.

    बुनियाद शो की एक तस्वीर
    फिर ‘शांति’, ‘हसरतें’ और ‘सांस’ जैसे शो आए, जिन्होंने टीवी की दुनिया को और विस्तार दिया.‘शांति’ में एक महिला पत्रकार की कहानी थी, जबकि ‘हसरतें’ ने विवाह और एक्स्ट्रा-मैरिटल रिश्तों जैसे संवेदनशील विषय को बेबाकी से छुआ. ‘सांस’, जिसे नीना गुप्ता ने लिखा और निर्देशित किया, रिश्तों में दरार और एक्स्ट्रा मैरिटल संबंधों की कहानी थी. उस समय टीवी पर रिश्ते सिर्फ सास-बहू की लड़ाई तक सीमित नहीं थे.

    फिर सास-बहू ने बदला खेल
    2000 के आसपास ‘क्योंकि सास भी कभी बहू थी’ और ‘कहानी घर घर की’ जैसे शोज ने टीवी की तस्वीर बदल दी. इसमें कोई शक नहीं कि इन सीरियल्स ने टीवी को जबरदस्त पॉपुलैरिटी दी. ‘कहानी घर घर की’ अपने दौर में लगातार टॉप रेटेड शोज में रही और कई मौकों पर 10 से ज्यादा TVR तक पहुंची.

    समस्या सास-बहू ड्रामा के होने में नहीं थी. समस्या तब शुरू हुई जब एक सफल फॉर्मूला ही पूरी इंडस्ट्री का फॉर्मूला बन गया.

    एक ही घर, दर्जनों रिश्ते, पीढ़ियों की छलांग, बदले की आग, पुनर्जन्म, प्लास्टिक सर्जरी, मरकर वापस लौटना और हर कुछ मिनट में नया ट्विस्ट- कहानी आगे बढ़ने के बजाय कई बार सिर्फ एपिसोड खींचने लगी.

    वायरल होने की होड़ ने भी बिगाड़ी साख
    आज स्थिति और दिलचस्प है. टीवी के पास पहले से कहीं ज्यादा प्लेटफॉर्म, तकनीक और टैलेंट है. लेकिन सोशल मीडिया के दौर में कई बार कहानी से ज्यादा ‘वायरल सीन’ महत्वपूर्ण हो जाता है.

    ऐसे सीन जो सिर्फ इसलिए बनाए जाते हैं कि उनका छोटा वीडियो सोशल मीडिया पर घूमे, अगले दिन मीम बने या लोग कहें- ‘ये क्या देख लिया!’ समस्या यहीं है. जब कंटेंट का लक्ष्य कहानी सुनाने के बजाय सिर्फ ट्रेंड करना हो जाए तो माध्यम की साख कमजोर होती है.

    अनुपमा शो का एक सीन
    लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं कि टीवी ‘डस्टबिन’ है.

    टीवी को याद करने की नहीं, अपनी जड़ें पहचानने की जरूरत है
    रोहित रॉय खुद उस दौर से आए हैं जब ‘स्वाभिमान’ जैसे शो टीवी पर पहचान बनाते थे. आज भी टीवी से निकले कई कलाकार फिल्मों और ओटीटी में अपनी जगह बना चुके हैं. टीवी ने कलाकारों को घर-घर पहचान दी है और करोड़ों दर्शकों को रोज मनोरंजन दिया है. इसलिए असली सवाल यह नहीं कि टीवी डस्टबिन है या नहीं. सवाल यह है कि क्या टीवी अपने पुराने लेखकों, मजबूत किरदारों और जमीन से जुड़ी कहानियों वाली परंपरा को फिर से पकड़ सकता है?

    ‘हम लोग’ ने समाज की बात की थी. ‘बुनियाद’ ने इतिहास को परिवार के जरिए समझाया. ‘हसरतें’ ने रिश्तों के ग्रे शेड्स दिखाए और ‘सांस’ ने विवाह की जटिलताओं को पर्दे पर उतारा. हमारा मतलब सीधा है कि- टीवी की बुनियाद कमजोर नहीं थी. शायद जरूरत सिर्फ इतनी है कि आज के मेकर्स कचरे में से वायरल सीन चुनने के बजाय उस बुनियाद की तरफ दोबारा लौटें. क्योंकि अच्छा टीवी कभी डस्टबिन नहीं था और अच्छा टीवी आज भी डस्टबिन बनने से बच सकता है.

     

    News Desk

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