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    ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में स्वदेशी हथियारों का दम, एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र ने IACCS-ब्रह्मोस की बताई ताकत

    News DeskBy News DeskSeptember 7, 2026No Comments7 Mins Read
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    ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में स्वदेशी हथियारों का दम, एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र ने IACCS-ब्रह्मोस की बताई ताकत
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     नई दिल्ली  

     सुरक्षा सभा में 'आसमान के रखवाले' सेशन के दौरान एयर मार्शल (रिटायर्ड) जितेंद्र मिश्र ने खुलकर बात की. वेस्टर्न एयर कमांड के पूर्व एयर ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ रहे एयर मार्शल मिश्र ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान आसमान में हुई घटनाओं का विस्तार से जिक्र किया। 

    उन्होंने साफ कहा कि भविष्य का युद्ध आज ही चल रहा है. जो लोग सोच रहे थे कि कुछ नहीं हो रहा, वास्तव में लंबी तैयारी, मेहनत और दूरदर्शिता का नतीजा ऑपरेशन सिंदूर में दिख रहा था. भारतीय वायुसेना ने स्वदेशी हथियारों और प्रणालियों के दम पर दुश्मन को करारा जवाब दिया. यह सिर्फ एक सैन्य अभियान नहीं था बल्कि वर्षों की मेहनत, वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और वायुसेना के संयुक्त प्रयास का प्रमाण था। 

    एयर मार्शल मिश्र ने सामान्य जीवन के उदाहरण से समझाया कि तकनीक कितनी गहराई तक पहुंच चुकी है. जब आप पेट्रोल पंप पर एटीएम कार्ड स्वाइप करते हैं तो वह सैटेलाइट के जरिए भारत के बैंक खाते से जुड़ता है, पैसे काटता है और तुरंत जानकारी वापस भेजता है. इसी तरह भविष्य के युद्ध भी रोजमर्रा की जिंदगी की तरह तकनीक पर आधारित होंगे, लेकिन हम उन्हें देख नहीं पाते क्योंकि वे धीरे-धीरे विकसित हो रहे हैं। 

    ब्रह्मोस एयर लॉन्च क्रूज मिसाइल को सुखोई-30 से दागने का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि 250- 300 किलोमीटर दूर लक्ष्य को दो मीटर की सटीकता से भेदना भारतीय तकनीक का चमत्कार है. आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आने के बाद तकनीक की रफ्तार और तेज हो गई है. अगर हम इसके साथ कदम नहीं मिलाएंगे तो चार-पांच साल में ही हैरान रह जाएंगे। 

    वायुसेना अधिकारी की निरंतर पढ़ाई और सिस्टम का विकास
    एयर मार्शल मिश्र ने नई पीढ़ी को संबोधित करते हुए कहा कि वायुसेना अधिकारी को परिचालन ड्यूटी निभाते हुए भी सामान्य छात्रों से कहीं ज्यादा पढ़ाई करनी पड़ती है. तकनीक के साथ तालमेल बनाए रखना अनिवार्य है. ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिन उपकरणों ने हमारे एयर स्पेस की रक्षा की और दुश्मन को नष्ट किया, वे वर्षों की मेहनत का फल थे. वायुसेना को अक्सर सबसे महंगी सेना कहा जाता है क्योंकि इसमें बजट का बड़ा हिस्सा लगता है, लेकिन यह दुनिया की उत्कृष्ट वायुसेनाओं में गिनी जाती है। 

    परिपक्व सिस्टम बनाने में पीढ़ियां लगती हैं. पंद्रह-बीस साल पहले भारतीय वायुसेना के पास ज्यादातर विदेशी रडार थे- रूस, अमेरिका, फ्रांस के. विदेशी विक्रेता से एयर डिफेंस सिस्टम बनवाने पर डेटा साझा करना पड़ता जो सार्वजनिक हो जाता. इसलिए भारतीय वैज्ञानिक, इंजीनियर और वायुसेना के अधिकारियों ने मिलकर पूरी तरह स्वदेशी इंटीग्रेटेड एयर कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम यानी आईएसीसीएस बनाया. इसमें करीब पंद्रह साल लगे। 

    आज देश के हर रडार- सैन्य, नागरिक, सेना और धीरे-धीरे नौसेना के, इस सिस्टम से जुड़े हैं. सात-आठ भूमिगत संचालन केंद्रों से पूरे देश की वायु स्थिति पर नजर रखी जा सकती है और जरूरत पड़ने पर सीमा पर हथियार दागे जा सकते हैं. पहले हर रडार के पास एक व्यक्ति बैठकर स्कोप देखता था। 

    अब डेटा नेटवर्क से सब जुड़ गया है. अलग-अलग देशों के रडारों के डेटा फॉर्मेट को तोड़कर एक सामान्य प्रारूप में लाया गया. दिल्ली, मुंबई, चेन्नई जैसे नागरिक टर्मिनलों के शक्तिशाली रडार भी इसमें शामिल हैं. इंटरनेट प्रोटोकॉल पर कमांड लेकर किसी भी जगह से मिसाइल दागने का आदेश दिया जा सकता है. यह सब एक दिन में नहीं हुआ. वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और पायलटों की पीढ़ियों ने असफलताओं से सीखा और फिर से कोशिश की। 

    बालाकोट से सिंदूर तक: रणनीतिक विस्तार और सटीकता का प्रमाण
    एयर मार्शल मिश्र ने बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर की तुलना रणनीतिक दृष्टि से की. बालाकोट के समय भी वायुसेना के पास वही क्षमता थी जो सिंदूर में इस्तेमाल हुई. अंतर संसाधनों की कमी का नहीं बल्कि रणनीति का था. सरकार के निर्णयों पर निर्भर करते हुए प्रतिक्रिया का विस्तार होता गया। 

    उड़ी हमले के बाद बालाकोट, फिर सिंदूर- यह चेतावनी का क्रम था. अगर दुश्मन नहीं मानता तो और बड़ा जवाब दिया जाता है. सिंदूर भी अंतिम नहीं है. तीस अप्रैल 2026 को रिटायर हो चुके एयर मार्शल ने कहा कि जो लोग अभी योजना बना रहे हैं उनके पास हर स्थिति के लिए तैयार योजनाएँ हैं। 

    सटीकता का प्रमाण देते हुए उन्होंने सैटेलाइट इमेजरी का जिक्र किया. बालाकोट में दो धब्बे दिखे थे. सिंदूर में बहावलपुर और मुरीद के नौ भवनों पर हमले की इमेज में भी वही दो स्पॉट दिखे. लेकिन जमीनी तस्वीरों से साफ हो गया कि कितना विनाशकारी और सटीक हमला हुआ था। 

    बालाकोट में मौसम या अन्य कारणों से जमीनी तस्वीर नहीं आ सकीं इसलिए सबूत कमजोर समझा गया. अब दोनों की तुलना से साबित होता है कि भारतीय वायुसेना का हमला कितना प्रभावी था. सैनिकों को जब 'कोई सबूत नहीं' या 'कौए मार दिए' जैसी बातें सुननी पड़ती हैं तो दर्द होता है, लेकिन वे परिणाम जानते हैं क्योंकि उन्होंने खुद देखा और किया है। 

    लंबी दूरी की क्षमता और वायु शक्ति की खूबियां
    एस-400 सिस्टम से 314 किलोमीटर दूर उड़ते विमान को मार गिराना लगभग विश्व रिकॉर्ड के करीब है. ब्रह्मोस एयर लॉन्च क्रूज मिसाइल दुनिया की एकमात्र परिचालन सुपरसोनिक एयर लॉन्च क्रूज मिसाइल है जो पूरी तरह स्वदेशी (रूस-भारत सहयोग से) है। 

    सरगोधा, रहीम यार खान जैसे ठिकानों पर कम से कम दो सौ किलोमीटर दूर से हमला संभव हुआ. वायु शक्ति जमीनी और नौसैनिक शक्ति से अलग है. यह तेज, लंबी दूरी तक पहुंचने वाली, सटीक और गतिशील है. हवा में उड़ान भरने के बाद भी वापस बुलाया जा सकता है जबकि जमीन से दागी मिसाइल एक बार निकलने के बाद नहीं लौटती. ईरान-इजरायल संघर्ष में भी यही देखा गया कि उड़ते विमानों की लचीलापन ज्यादा होती है। 

    स्वदेशीकरण का मतलब संप्रभुता
    एयर मार्शल मिश्र ने स्वदेशीकरण को मेक इन इंडिया या सर्वश्रेष्ठ होने से अलग बताया. उनके अनुसार स्वदेशीकरण संप्रभुता के बराबर है. अगर आप किसी दूसरे देश पर निर्भर हैं तो सीमाओं की रक्षा स्वतंत्र रूप से नहीं कर सकते. पाकिस्तान के कई अमेरिकी मूल के रडार नष्ट होने के बाद मरम्मत के लिए अमेरिकी तकनीशियनों का इंतजार करना पड़ा. इससे सुरक्षा में बड़ा अंतराल पैदा हो गया। 

    अगर रडार स्वदेशी होते तो भारतीय कंपनियां, स्टार्टअप और पीएसयू तुरंत ठीक कर देते. संप्रभुता सिर्फ जमीन, कानून और लोगों तक सीमित नहीं. यह स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता है. युद्ध में अगर मिसाइल बाहर से मँगवानी पड़े और सप्लायर मना कर दे तो फैसला आपके हाथ में नहीं रहता। 
    एलसीए तेजस में देरी को लेकर उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी देश पूरा विमान अकेले नहीं बनाता. अमेरिका भी कई हिस्से बाहर से लेता है. संप्रभुता पूरे विमान बनाने में नहीं बल्कि उस महत्वपूर्ण पिन या धातु विज्ञान, डिजाइन और गुणवत्ता में है जो पूरे विमान को संभाले। 

    अगर वह पिन विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी लागत पर बन जाए तो संप्रभुता हासिल हो जाती है. पोखरण-2 के बाद प्रतिबंधों ने क्रिटिकल तकनीकें रोक दीं. आर्थिक, राजनीतिक और कूटनीतिक ताकत बढ़ने के साथ विकास तेज हुआ. डिजाइनर, उत्पादन एजेंसी और उपयोगकर्ता तीनों की जिम्मेदारी है. गलतियां करके सीखना पड़ता है. मारुति से लेकर एलसीए मार्क-1, मार्क-2 तक का सफर तय करना होगा। 

    ड्रोन की भूमिका और भविष्य की तैयारी
    ड्रोन को लेकर एयर मार्शल मिश्र का नजरिया संतुलित था. वे खुद फाइटर पायलट रहे हैं इसलिए ड्रोन को 'बाद का पक्षी' कहते हैं. भारी काम निश्चित पंख वाले विमान ही करते हैं. ईरान-इजरायल संघर्ष के शुरुआती दिनों में अमेरिका और इजरायल रोज सौ फाइटर सॉर्टी उड़ा रहे थे। 

    तीन परमाणु स्थलों पर एक मिशन में 137 विमान शामिल थे. ड्रोन कहां थे? ड्रोन महत्वपूर्ण अंतराल भरते हैं जहां पंख वाला विमान भेजना जोखिम भरा या महंगा हो. उन्हें बड़ी संख्या में बनाया जा सकता है. पायलट का मतलब कॉकपिट में बैठने वाला नहीं बल्कि नियंत्रण करने वाला है. एमक्यू-9 जैसे सिस्टम में बाहरी पायलट हजारों किलोमीटर दूर से उड़ाते हैं. सरकार, अकादमी और कॉर्पोरेट सब मिलकर स्वदेशी ड्रोन बना रहे हैं जो अच्छी बात है। 

    ऑपरेशन सिंदूर ने साबित कर दिया कि स्वदेशी हथियार न सिर्फ कामयाब हैं बल्कि संप्रभुता का आधार हैं. आईएसीसीएस जैसी प्रणालियां, ब्रह्मोस जैसी मिसाइलें और लंबी दूरी की क्षमताएं भारतीय वायुसेना को मजबूत बनाती हैं. भविष्य के युद्ध तकनीक, एकीकरण और स्वतंत्र निर्णय क्षमता पर निर्भर करेंगे। 

    एयर मार्शल जितेंद्र मिश्र के शब्दों में, यह सब एक दिन में नहीं हुआ बल्कि पीढ़ियों की मेहनत का फल है. देशवासियों को यह समझना चाहिए कि आसमान की रक्षा चौबीस घंटे, हर सेकंड चल रही है. वह पूरी तरह भारतीय प्रयासों से संभव हो रही है। 

    News Desk

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