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    Home»देश»सिंधु पर फैसला देने वाले हेग कोर्ट को भारत ने क्यों ठुकराया? जानें किस आधार पर खारिज किया आदेश
    देश

    सिंधु पर फैसला देने वाले हेग कोर्ट को भारत ने क्यों ठुकराया? जानें किस आधार पर खारिज किया आदेश

    News DeskBy News DeskSeptember 1, 2026No Comments6 Mins Read
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    सिंधु पर फैसला देने वाले हेग कोर्ट को भारत ने क्यों ठुकराया? जानें किस आधार पर खारिज किया आदेश
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    नई दिल्ली
     भारत के निजी मामले में दखलअंदाजी करने की कोशिश कर रही अंतरराष्ट्रीय संस्था को भारत ने उसकी हैसियत याद दिला दी। इस संस्था ने सिंधु समझौते पर पाकिस्तान के पक्ष में फैसला दिया था। संस्था को लगा कि इससे भारत के ऊपर दबाव बनेगा, लेकिन भारत ने उस अंतरराष्ट्रीय संस्था को सीधे ठेंगा दिखा दिया और उसके किसी भी आदेश को मानने से साफ मना कर दिया। इस संस्था का नाम ' कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ' (CoA) है और इसका ऑफिस नीदरलैंड के सुंदर और बेहद अहम शहर द हेग में है।

    संस्था को ही बता दिया गैर कानूनी
    भारत ने सोमवार को 'कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' के फैसले को मानने से मना कर दिया। संस्था का फैसला सिंधु जल संधि से जुड़ा था। इतना ही नहीं भारत ने कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन 'गैर-कानूनी तरीके से गठित तक बता दिया और कहा कि संस्था के फैसले का भारत के संप्रभु फैसलों पर कोई असर नहीं पड़ता। विदेश मंत्रालय (MEA) ने एक बयान में कहा कि 'कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन' का गठन वर्ल्ड बैंक ने किया था। ये पाकिस्तान के साथ भारत की 1960 की संधि की शर्तों का साफ तौर पर उल्लंघन था।

    कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन का निर्देश खारिज
    इन घटनाक्रमों से साफ है कि सिंधु जल संधि को लेकर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद फिर बढ़ गया। दरअसल, हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने कहा था कि भारत सिंधु जल संधि को एकतरफा तौर पर न तो रोक सकता है और न ही खत्म कर सकता है। भारत ने इस फैसले को सीधे तौर पर खारिज कर दिया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत ने इस कोर्ट को कभी मान्यता नहीं दी है। इसलिए भारत न तो इसकी कार्यवाही में शामिल हुआ और न ही इसके पहले दिए गए किसी फैसले को स्वीकार किया है।

    सिंधु जल संधि अस्थायी तौर पर स्थगित
    भारतीय विदेश मंत्रालय के मुताबिक कोर्ट का मौजूदा या भविष्य में आने वाला कोई भी फैसला भारत की ओर से चलाए जा रहे प्रोजेक्ट या उसके फैसलों पर असर नहीं डालेगा। विदेश मंत्रालय ने साफ किया कि भारत का सिंधु जल संधि को अबेयंस में रखने का फैसला लागू है। यानी भारत ने संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियों को फिलहाल रोक रखा है। मंत्रालय ने कहा कि भारत अपने इस फैसले पर कायम है। दरअसल, अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को स्थगित करने का फैसला लिया था। भारत का कहना रहा है कि पाकिस्तान के साथ सामान्य संबंधों के लिए आतंकवाद और पानी के मुद्दे को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता।

    अदालत ने रतले प्रोजेक्ट पर भी टिप्पणी की
    मध्यस्थता अदालत ने जम्मू-कश्मीर में बन रहे रतले जलविद्युत संयंत्र से जुड़े कुछ निर्माण कार्यों पर अस्थायी रोक लगाने का निर्देश भी दिया है। अदालत का कहना है कि सिंधु जल संधि के तहत किसी एक देश को अपने स्तर पर संधि को रोकने, निलंबित करने या खत्म करने का अधिकार नहीं है।

    वहीं भारत इस पूरे निष्कर्ष को मानने से इनकार कर रहा है। भारत का तर्क है कि जिस संस्था के अधिकार क्षेत्र को ही वह स्वीकार नहीं करता, उसके फैसले उसके लिए बाध्यकारी नहीं हो सकते।

    सिंधु जल संधि: आखिर विवाद है किस बात पर?
    भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि 1960 में हुई थी। इसके तहत सिंधु नदी प्रणाली की छह नदियों के पानी के इस्तेमाल को लेकर दोनों देशों के अधिकार और जिम्मेदारियां तय की गई थीं।

    हाल के वर्षों में इस संधि को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा है। भारत ने संधि को स्थगित रखने का फैसला लिया है जबकि पाकिस्तान लगातार संधि को लागू रखने की मांग करता रहा है। इसी विवाद के बीच पाकिस्तान की पहल पर मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू हुई। भारत ने इस प्रक्रिया में शामिल होने से इनकार किया और अपनी अलग आपत्तियां दर्ज कराईं।

    भारत का रुख साफ: संधि पर हमारा फैसला कायम
    विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में दोहराया कि भारत इस तथाकथित मध्यस्थता संस्था के किसी भी फैसले को मान्यता नहीं देता।

    भारत के मुताबिक, इस संस्था का गठन ही संधि के प्रावधानों के खिलाफ है। इसलिए उसके द्वारा सुनाया गया कोई भी फैसला भारत के लिए बाध्यकारी नहीं है। इस तरह सिंधु जल संधि को लेकर अब दो बिल्कुल अलग दावे सामने हैं। हेग की मध्यस्थता अदालत संधि को लागू मान रही है जबकि भारत अदालत के अधिकार क्षेत्र और उसके फैसले- दोनों को ही खारिज कर रहा है।

    इस विवाद का असर भारत-पाकिस्तान के बीच पानी के बंटवारे के साथ-साथ जम्मू-कश्मीर में चल रही जलविद्युत परियोजनाओं पर भी देखने को मिल सकता है।
    सिंधु जल संधि: भारत को पाकिस्तान से दोबारा बातचीत की जरूरत क्यों पड़ी? 

    समझिए विवाद की पूरी कहानी
    भारत ने पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सिंधु जल संधि (Indus Waters Treaty) को ‘स्थगित’ (In Abeyance) रखने का फैसला अभी तक बरकरार रखा है। पिछले कुछ हफ्तों में पाकिस्तान की ओर से कई तीखी और राजनीतिक बयानबाज़ियां सामने आई हैं। पाकिस्तान ने पिछले महीने इस संधि पर एक तथाकथित ‘अंतरराष्ट्रीय’ कॉन्फ्रेंस भी आयोजित की। इसमें वरिष्ठ केंद्रीय मंत्रियों और प्रमुख नेताओं ने चेतावनी दी कि अगर सिंधु नदी बेसिन की नदियों के जल प्रवाह में किसी तरह की रुकावट डाली गई तो इसके गंभीर परिणाम होंगे और युद्ध जैसी हालात भी पैदा हो सकते हैं।

    आर्बिट्रेशन कोर्ट ने बयान में क्या कहा था?
    कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने सोमवार को जारी अपने बयान में कहा था कि भारत ने जिस आधार पर संधि को स्थगित किया है, वह संधि को रोकने या खत्म करने के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा कि सिंधु जल संधि अभी भी पूरी तरह लागू है और भारत को संधि के तहत अपनी जिम्मेदारियां निभानी चाहिए। भारत ने इस दावे को भी स्वीकार नहीं किया। विदेश मंत्रालय ने कहा कि यह कोर्ट जिस तरह से बनाया गया है, वह खुद सिंधु जल संधि की शर्तों का उल्लंघन है। इसलिए भारत के लिए इसके फैसले की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है।

    पाकिस्तान संधि लागू करने की लगा रहा गुहार
    भारत का कहना है कि कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के पास इन मामलों में अधिकार क्षेत्र ही नहीं है। वहीं पाकिस्तान संधि को लागू रखने और भारत पर उसकी शर्तों का पालन कराने की मांग करता रहा है। इस ताजा फैसले के बाद भी भारत ने साफ कर दिया है कि वह इस कोर्ट की बात नहीं मानेगा और सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का उसका फैसला जारी रहेगा।

    News Desk

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