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    सिंधु जल संधि पर भारत का सख्त रुख, आतंकवाद बंद किए बिना बहाल नहीं होगी संधि

    News DeskBy News DeskJuly 22, 2026No Comments7 Mins Read
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    सिंधु जल संधि पर भारत का सख्त रुख, आतंकवाद बंद किए बिना बहाल नहीं होगी संधि
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     नई दिल्ली

    पाकिस्तान की ओर से सिंधु जल संधि को लेकर बढ़ती मांग के बीच भारत ने अपना रुख और कड़ा कर लिया है. सरकारी सूत्रों के हवाले से समाचार एजेंसी ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि भारत का कहना है कि 65 साल पुराने इस समझौते में पूरी तरह बदलाव की जरूरत है और ये अपने मौजूदा स्वरूप में जारी नहीं रह सकता. भारत ने ये भी स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य की किसी भी व्यवस्था के लिए पाकिस्तान को ये साबित करना होगा कि उसने सीमा पार आतंकवाद खत्म कर दिया है। 

    समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट में सरकारी सूत्रों ने स्पष्ट किया है कि यदि नदियों के पानी के बंटवारे से जुड़े प्रावधानों को दोबारा सक्रिय करना है तो उन्हें एक अलग और संशोधित रूप में ही करना होगा। 

    भारत का कहना है कि ये कदम तभी संभव है, जब इस्लामाबाद भारत के खिलाफ प्रायोजित आतंकवाद को पूरी तरह से बंद कर दे. हालांकि, भारत फिलहाल इस संधि से पूरी तरह हटने की कोशिश नहीं कर रहा है, लेकिन एक संप्रभु राष्ट्र होने के नाते उसके पास अपने हितों के खिलाफ जाने वाली किसी भी संधि को खत्म करने का पूर्ण अधिकार सुरक्षित है। 

    'झूठा नैरेटिव फैला रहा पाकिस्तान'
    भारतीय सूत्रों ने पाकिस्तान के उस झूठे नैरेटिव को सिरे से खारिज कर दिया है, जिसमें कहा जा रहा था कि भारत द्वारा संधि को स्थगित करने से वहां पानी की किल्लत हो रही है। 

    भारत का कहना है कि पाकिस्तान को मिलने वाले पानी का एक बड़ा हिस्सा उसके अपने पास भंडारण क्षमता (स्टोरेज इंफ्रास्ट्रक्चर) की कमी, व्यापक रिसाव (लीकेज) और उसके अपने प्रांतों के बीच जारी पानी के विवादों के कारण बर्बाद हो जाता है। 

    दरअसल, भारत द्वारा इस संधि को स्थगित करने का फैसला पिछले साल अप्रैल में पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले के बाद लिया गया था. इस आतंकी हमले में 26 नागरिकों की जान चली गई थी, जिसकी जिम्मेदारी लश्कर-ए-तैयाबा के प्रॉक्सी संगठन 'द रेजिस्टेंस फ्रंट' ने ली थी. इस हमले के जवाब में भारत ने कई राजनयिक और आर्थिक कदम उठाए थे, जिनमें सिंधु जल संधि को स्थगित करना भी शामिल था. इसके बाद मई में भारत ने पाकिस्तान में आतंकी बुनियादी ढांचे को निशाना बनाने के लिए 'ऑपरेशन सिंदूर' भी चलाया था। 

    1960 में हुई थी सिंधु जल संधि
    बता दें कि विश्व बैंक की मध्यस्थता में 19 सितंबर 1960 को भारत और पाकिस्तान के बीच 9 साल की लंबी बातचीत के बाद ये संधि हुई थी. इसके तहत भारत को पूर्वी नदियों- रावी, ब्यास और सतलुज पर अधिकार है, जबकि पाकिस्तान को पश्चिमी नदियों- सिंधु, झेलम और चिनाब का नियंत्रण मिला है. ये समझौता भारत को पाकिस्तान जाने से पहले पश्चिमी सहायक नदियों पर किश्तवाड़ और रतले जैसी 'रन-ऑफ-रिवर' जलविद्युत परियोजनाएं बनाने की भी अनुमति देता है। 

    अब मौजूदा स्वरूप में नहीं होगा सिंधु जल संधि
    सूत्रों की मानें तो सिंधु जल संधि अब अपने मौजूदा स्वरूप में बिल्कुल भी काम नहीं करेगी. अगर भविष्य में नदियों के पानी के बंटवारे से जुड़े प्रावधान फिर से लागू किए जाते हैं तो उन्हें नए ढांचे और नई शर्तों के तहत लागू करना होगा. मौजूदा व्यवस्था में ऐसा नहीं होगा. सूत्र ने आगे कहा कि सिंधु जल संधि से पूरी तरह बाहर निकलने के कड़े कदम पर विचार करने से पहले भारत आगे के घटनाक्रम का इंतजार करेगा। 

    क्या संधि से निकलने का कोई प्रावधान है?
    हालांकि, सिंधु जल संधि में समझौते से बाहर निकलने का कोई प्रावधान यानी एक्जिट क्लॉज नहीं है, लेकिन भारत के लिए यह अहम है कि ‘संधि कानून पर वियना कन्वेंशन’ का अनुच्छेद 60 कहता है कि किसी एक पक्ष द्वारा संधि का गंभीर उल्लंघन होने पर प्रभावित अन्य पक्ष संधि को पूरी तरह या आंशिक रूप से निलंबित कर सकते हैं. हालांकि भारत और पाकिस्तान दोनों इस कन्वेंशन के सदस्य नहीं हैं, लेकिन भारत का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय प्रथागत कानून के तहत पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद को समर्थन देना संधि के दायित्वों का गंभीर उल्लंघन माना जा सकता है। 

    भारत को नहीं किया जा सकता संधि बहाल करने पर मजबूर
    रिपोर्ट में भारतीय अधिकारियों के हवाले से कहा गया है कि एक संप्रभु देश होने के नाते भारत को ऐसी संधि में बने रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, जो उसके हित में न हो. ये बातें ऐसे समय में कही जा रही हैं जब पाकिस्तान सिंधु जल संधि के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश कर रहा है. पाकिस्तान का आरोप है कि भारत ने संधि को एकतरफा और गैरकानूनी तरीके से स्थगित किया है, जिससे उसके 24 करोड़ नागरिकों की जल सुरक्षा और आजीविका पर खतरा पैदा हो गया है। 

    भारत तब भी करता है मदद
    हालांकि, सिंधु संधि स्थगित होने के बावजूद भारत पाकिस्तान की मदद कर रहा है. भारत मानवीय आधार पर पाकिस्तान को बाढ़ संबंधी चेतावनियां देता रहता है, ताकि जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके. भारत का कहना है कि पाकिस्तान खुद को पीड़ित दिखाने की कोशिश कर रहा है, जबकि सच्चाई यह है कि सिंधु नदी प्रणाली का जितना पानी भारत के हिस्से में आता है, उससे ज्यादा पानी पाकिस्तान में खराब जल प्रबंधन और सतही बहाव के कारण बर्बाद हो जाता है। 

    भारत का सिंधु पर क्या स्टैंड
    सूत्रों का यह भी कहना है कि समझौते के तहत सिंधु बेसिन का लगभग 80 फीसदी पानी मिलने के बावजूद पाकिस्तान ने 1976 से न तो कोई बड़ा स्टोरेज प्रोजेक्ट बनाया है और न ही पानी के आधुनिक प्रबंधन में कोई निवेश किया है. भारत के नजरिए से पाकिस्तान की समस्या पानी की उपलब्धता नहीं, बल्कि पानी का प्रबंधन है. हालांकि, भारत के लिए मुख्य मुद्दा पाकिस्तान का सीमा-पार आतंकवाद को समर्थन देना है. भारत का कहना है कि सिंधु जल समझौता को रोके रखने की कोई समय-सीमा तय नहीं है. भारत का रुख साभ है कि जब तक पाकिस्तान भरोसेमंद और पक्के तौर पर सीमा-पार आतंकवाद को समर्थन देना बंद नहीं करता, तब तक यह समझौता रुका रहेगा. यह सबसे जरूरी शर्त है। 

    विवाद समाधान में PAK का अड़ियल रवैया
    सूत्रों का कहना है कि संधि को लागू करने के शुरुआती वर्षों से ही पाकिस्तान ने भारत की लगभग हर परियोजना पर आपत्ति जताई है, चाहे वह छोटी 200 किलोवाट की परियोजना हो या सलाल, तुलबुल, बगलिहार, किश्तवाड़, रैटल और पाकल दुल जैसी बड़ी परियोजनाएं हों. पाकिस्तान का रवैया सहयोग के बजाय हमेशा बाधा डालने वाला रहा है. उसने विवाद निवारण के क्रमिक तंत्र का उल्लंघन करते हुए तकनीकी मुद्दों को जबरन तीसरे पक्ष के मंचों पर उठाया है. संधि को निलंबित करने से पहले भारतीय पक्ष ने इसमें संशोधन की पुरजोर वकालत की थी और इसके लिए कुछ विवादों को सुलझाने में इस्लामाबाद के अड़ियल रवैये का हवाला दिया था। 

    भारत ने जताई थी आपत्ति
    वहीं, साल 2015 में पाकिस्तान ने किश्तवाड़ और रैटल परियोजनाओं पर आपत्तियों के लिए न्यूट्रल एक्सपर्ट नियुक्त करने की मांग की थी, लेकिन 2016 में वह एकतरफा रूप से पीछे हट गया और मध्यस्थता अदालत (कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन) की मांग करने लगा.
    विश्व बैंक ने दोनों को नियुक्त कर दिया, जिसे भारत ने स्वीकार नहीं किया. भारत न्यूट्रल एक्सपर्ट की बैठकों में शामिल तो हुआ, लेकिन मध्यस्थता अदालत की कार्यवाही से दूर रहा. क्योंकि एक साथ दो समानांतर प्रक्रियाएं नहीं चलाई जा सकतीं। 

    पाकिस्तान में बेखौफ हैं आतंकी
    भारत ने ये भी मुद्दा उठाया है कि पाकिस्तान ने आतंकवाद को रोकने के लिए कोई विश्वसनीय कदम नहीं उठाए हैं. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की 1267 प्रतिबंध समिति द्वारा प्रतिबंधित व्यक्ति और संगठन आज भी पाकिस्तान में सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई दे रहे हैं और खुलेआम जहर उगल रहे हैं. नियंत्रण रेखा (LoC) के पार की गतिविधियों से साफ पता चलता है कि आतंकवाद पर लगाम लगाने के लिए पाकिस्तान की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। 

    भारत ने अंत में ये पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है कि सिंधु जल संधि का भविष्य पूरी तरह से पाकिस्तान के व्यवहार पर निर्भर करेगा. पाकिस्तान को आतंकवाद पर अपना समर्थन हमेशा के लिए खत्म करना होगा और संधि के प्रति अपना अड़ियल रवैया छोड़ना होगा. जब तक ऐसा नहीं होता, तब तक ये 65 साल पुरानी संधि अपने पुराने रूप में किसी भी कीमत पर दोबारा शुरू नहीं हो सकती है। 

    News Desk

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