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    Home»राजनीती»महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर मोदी सरकार का मिशन-360, बदला संसद का गणित
    राजनीती

    महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर मोदी सरकार का मिशन-360, बदला संसद का गणित

    News DeskBy News DeskJuly 17, 2026No Comments6 Mins Read
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    महिला आरक्षण और परिसीमन बिल पर मोदी सरकार का मिशन-360, बदला संसद का गणित
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    नई  दिल्ली
     संसद का मॉनसून सत्र 20 जुलाई से शुरू हो रहा है. मोदी सरकार एक बार फिर से महिला के लिए 33 फीसदी आरक्षण वाला बिल और लोकसभा में सीट बढ़ाने वाले परिसीमन बिल को दोबारा से संसद सत्र में लाने की तैयार में है. अप्रैल में संसद के विशेष सत्र के दौरान मोदी सरकार इस बिल को लेकर आई थी, लेकिन दो-तिहाई बहुमत न जुटा पाने के चलते पास नहीं करा सकी थी. ये मोदी सरकार के लिए बड़ा सियासी झटका था.

    नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद पहली बार रहा जब एनडीए सरकार किसी बिल को सांसद से पास नहीं करा सकी थी. अब तीन महीने के बाद एक बार फिर से सरकार महिल आरक्षण और परिसीमन बिल को मॉनसून सत्र में पास कराने की प्लानिंग में है. ऐसे में अप्रैल से जुलाई आते-आते सिर्फ मौसम का मिजाज ही नहीं बदला बल्कि संसद का सियासी गणित भी बदल गया है.

    अप्रैल में संसद के विशेष सत्र के दौरान बिल पर वोटिंग हुई थी तो सरकार दो-तिहाई बहुमत न होने से बिल गिर गया था. सियासत में तीन महीने का समय बड़े-बड़े समीकरणों को उलटने-पलटने के लिए काफी होता है. मॉनसून सत्र आते-आते ऐसी पतझड़ हुई कि विपक्ष के कई सांसद टूट सरकार के खेमे में खड़े हैं. इस तरह परिसीमन बिल को दोबारा पास कराने की जमीन तैयार की है, जो रणनीतिक रूप से काफी दिलचस्प है.

    तीन महीने में कैसे बदल गया पूरा गेम
    मोदी सरकार संसद के विशेष सत्र के दौरान यानी अप्रैल में जब परिसीमन बिल को पास कराने की कवायद की तो सफल नहीं रही. सदन में मौजूद 528 सदस्यों में से 298 ने बिल के पक्ष में और 230 ने खिलाफ वोट डाले थे. संविधान संसोधन बिल के लिए मौजदू सांसद सदस्यों के दो-तिहाई सदस्य चाहिए होते हैं. लोकसभा में फिलहाल 540 सदस्य हैं, जिसके आधार पर दो-तिहाई बहुमत के लिए 360 सदस्यों का समर्थन बनता है.

    अप्रैल में बिल गिरने की सबसे बड़ी वजह यह थी कि सरकार के पास लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई (2/3) बहुमत नहीं था. सरकार ने इसे साधने के लिए विपक्ष को अपने खेमे के साथ लाने की कोशिश की थी, लेकिन विपक्षी एकजुटता के चलते सफल नहीं हो सकी थी. उसके बाद से ही सरकार ने दो-तिहाई बहुमत जुटाने के लिए अपना सियासी तानाबाना बुनना शुरू कर दिया था.

    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद सियासत ही बदल गई.  ममता बनर्जी की टीएमसी, उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) में बगावत के बाद शरद पवार का मन बदल गया है. इसके बाद उद्धव ठाकरे की पार्टी का तेवर भी ढीले पड़ गए हैं.  डीएमके और कांग्रेस की दोस्ती भी टूट गई है. ऐसे में सरकार के हौसले बुलंद हैं और महिला आरक्षण व परिसीमन बिल को मॉनसून सत्र में पास कराने के लिए अपने नंबर को पक्का कर रही है.

    मॉनसून सत्र आते-आते सियासी पतझड़
    अप्रैल से जुलाई के बीच NDA सरकार ने लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत (360सीटें) का जादुई आंकड़ा हासिल करने के लिए विपक्ष के बड़े किलों में सेंध लगाई है. विपक्षी खेमे में सबसे बड़ा झटका पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी को लगा है. टीएमसी के 28 में से 20 लोकसभा सांसदों ने ममता बनर्जी से अलग होकर एनडीए के समर्थन में खड़े दिखाई दे रहे हैं. इतना ही नहीं टीएमसी के 13 राज्यसभा सांसदों में से 4 सांसद इस्तीफा दे दिए हैं, जिसमें तीन सांसद बीजेपी से चुन लिए गए हैं.

    महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे गुट को भी नुकसान उठाना पड़ा है, जहां उनके 9 में से 6 लोकसभा सांसदों ने शिंदे की पार्टी में शामिल हो गए हैं. इस तरह विपक्ष के दो बड़े सहयोगी दलों में टूट पड़ी. इसके अलावा शरद पवार की पार्टी के 8 लोकसभा सांसद हैं. शरद पवार ने भी परिसीमन बिल पर मोदी सरकार को समर्थन करने के संकेत दिए हैं. शरद पवार के बाद उद्धव ठाकरे की पार्टी के तेवर ढीले पड़ गए हैं. संजय राउत ने कुछ शर्तों के साथ सरकार को समर्थन करने के संकेत दिए हैं.

    डीएमके अब तमिलनाडु की सत्ता से बाहर है और कांग्रेस के साथ उसके रिश्ते खराब हो गए हैं. डीएमके 22 लोकसभा सांसद हैं, जो लोकसभा स्पीकर से सदन में कांग्रेस से अलग बैठने के लिए कहा है. इस तरह डीएमके पर भी सरकार की नजर है और उसके समर्थन हासिल करने के लिए बैकडोर से साझने में जुटी है.

    दो-तिहाई बहुमत के कितने करीब सरकार
    लोकसभा में कुल 543 सीटें है, जिसमें से फिलहाल 3 सीटें खाली है. इस लिहाज से संविधान संसोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत 360 सदस्यों के जरूरत होती है. अप्रैल में एनडीए को 298 सांसदों का समर्थन मिला था. बीजेपी के अगुवाई वाले एनडीए के पास 293 सांसदों का सैमर्थन है. तृणमूल कांग्रेस से अलग हुए एनसीपीआई के 20 सांसदों के साथ-साथ डीएमके के 22 सांसदों का भी समर्थन सरकार को मिलता है, तो संसद में सरकार की स्थिति और मजबूत हो सकती है.

    मौजूदा आंकड़ों को देखें तो एनडीए के पास फिलहाल लगभग 293 सांसद हैं. इसमें टीएमसी से एनसीपीआई में गए 20 और डीएमके के 22 सांसद जुड़ते हैं, तो यह संख्या करीब 335 तक पहुंच जाएगी. इसके अलावा सरकार को समय-समय पर वाईएसआरसीपी के 4 सांसदों और एक निर्दलीय सांसद का भी समर्थन मिलता रहा है. ऐसे में यह संख्या लगभग 340 तक पहुंच सकती है.

    हाल ही में महाराष्ट्र की राजनीति में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है. उद्धव ठाकरे गुट के छह सांसदों के एकनाथ शिंदे के साथ आने के बाद यदि इन्हें भी एनडीए के समर्थन में जोड़ा जाए तो गठबंधन की ताकत करीब 346 सांसदों तक पहुंच सकती है.  शरद पवार की पार्टी के 8 सांसद भी सरकार का समर्थन करते हैं, तो एनडीए का आंकड़ा बढ़कर 354 सांसदों तक पहुंच सकता है. ऐसे में उसे दो-तिहाई बहुमत हासिल  के लिए केवल छह और सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी. ऐसे में उद्धव ठाकरे के तीन सांसदों का समर्थन मिल जाता है तो फिर ये नंबर 357 पहुंच जाएगा और उसे सिर्फ तीन सांसदों के समर्थन की जरूरत होगी.

    मोदी सरकार की एक्सरसाइज तेज
    मोदी सरकार अपने मिशन-360 से अभी तीन  कदम दूर है यानि दो-तिहाई बहुमत के लिए 3 अतरिक्त सांसदों के समर्थन जुटाना होगा. इस राजनीतिक गणित के बीच पिछले कुछ दिनों में बीजेपी नेतृत्व की गतिविधियां तेज रही हैं. गृह मंत्री अमित शाह ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मुलाकात की. इसके अलावा उन्होंने महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और शिंदे गुट में शामिल हुए छह सांसदों से भी अलग-अलग बैठकें की हैं. इसके अलावा कुछ अन्य दलों से भी संपर्क साधा जा रहा है, लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष भी एक्टिव है.

    News Desk

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