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    ₹39,000 करोड़ का डिफेंस प्रोग्राम! एयर डिफेंस सिस्टम भी होगा बेअसर, जानें क्यों माना जा रहा है गेमचेंजर

    News DeskBy News DeskJuly 10, 2026No Comments4 Mins Read
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    ₹39,000 करोड़ का डिफेंस प्रोग्राम! एयर डिफेंस सिस्टम भी होगा बेअसर, जानें क्यों माना जा रहा है गेमचेंजर
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    बेंगलुरु 

    भारत ने फ्रांस के साथ हाल में 114 राफेल फाइटर जेट खरीद को लेकर करार किया है. यह डील 3.25 लाख करोड़ रुपये की है. इंडियन एयरफोर्स के बेड़े में पहले से ही 36 राफेल फाइटर जेट मौजूद हैं. 114 नए जेट आने से यह संख्‍या 150 तक पहुंच जाएगी. इसका मतलब यह है कि भारतीय वायुसेना के बेड़े में राफेल जेट के 8 से भी ज्‍यादा स्‍क्‍वाड्रन होंगे. इसके साथ ही स्‍वदेशी तकनीक से तेजस फाइटर जेट भी डेवलप किए जा रहे हैं. इन सबके बीच रक्षा वैज्ञानिक ऐसा ड्रोन सिस्‍टम डेवलप करने में जुटे हैं, जो रडार और एयर डिफेंस सिस्‍टम को भी बाइपास करने में सक्षम होंगे. इस स्‍टील्‍थ ड्रोन के ऑपरेशन में आने से हवाई युद्ध का स्‍वरूप बदल सकता है. घातक स्‍टील्‍थ ड्रोन प्रोजेक्‍ट पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। 

    भारत भविष्य के हवाई युद्ध की तैयारियों को नई गति देने के लिए अपने महत्वाकांक्षी स्टील्थ मानव रहित लड़ाकू विमान (UCAV) कार्यक्रम ‘घातक’ को नए स्वरूप में आगे बढ़ा रहा है. अब इस परियोजना को रिमोटली पायलटेड स्ट्राइक एयरक्राफ्ट (RPSA) पहल के तहत विकसित किया जा रहा है. करीब 39 हजार करोड़ रुपये की अनुमानित लागत वाला यह कार्यक्रम केवल एक तकनीकी परियोजना नहीं रह गया है, बल्कि इसे पूर्ण सैन्य अधिग्रहण कार्यक्रम के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसके सफल होने पर भारतीय वायुसेना की मारक क्षमता और भविष्य के युद्ध लड़ने की रणनीति में बड़ा बदलाव आएगा। 

    SWIFT बना आधार
    इस परियोजना की नींव SWIFT (Stealth Wing Flying Testbed) जेट के जरिए रखी गई थी. SWIFT ने फ्लाइंग-विंग स्टील्थ डिजाइन, ऑटोनोमस फ्लाइट कंट्रोल सिस्‍टम और आंतरिक हथियार कक्ष (Internal Weapons Bay) जैसी कई अहम तकनीकों का सफल परीक्षण किया. इन तकनीकों का उद्देश्य विमान की रडार पर पहचान को बेहद कम करना और दुश्मन के अत्यधिक सुरक्षित हवाई क्षेत्र में गहराई तक प्रवेश करने की क्षमता विकसित करना है. हालांकि, RPSA केवल इन तकनीकों तक सीमित नहीं है. इसका मुख्य उद्देश्य बड़े पैमाने पर उत्पादन और भारतीय वायुसेना के मौजूदा तथा भविष्य के लड़ाकू विमानों के साथ बेहतर तालमेल स्थापित करना है. यही कारण है कि इसे भारत के सबसे महत्वपूर्ण रक्षा आधुनिकीकरण कार्यक्रमों में से एक माना जा रहा है। 

    राफेल-तेजस से ज्‍यादा खतरनाक?
    इस परियोजना की एक और महत्वपूर्ण विशेषता डेवलपमेंट-कम-प्रोडक्शन पार्टनर (DCPP) मॉडल को अपनाना है. इसके तहत निजी रक्षा कंपनियों को भी परियोजना के विकास और निर्माण में बड़ी भूमिका दी जाएगी. इससे उन्नत कंपोजिट सामग्री, आधुनिक एवियोनिक्स, AI और सेंसर तकनीक जैसे क्षेत्रों में निजी उद्योग की विशेषज्ञता का लाभ मिलेगा. यह कदम रक्षा क्षेत्र में सार्वजनिक और निजी साझेदारी को मजबूत करने के साथ-साथ ‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान को भी नई मजबूती देगा. राफेल और तेजस जैसे फाइटर जेट स्‍टील्‍थ नहीं हैं, जब‍कि घातक प्रोगाम के तहत डेवलप किए जाने वाले ड्रोन नेक्‍स्‍ट जेनरेशन के होंगे, जिन्‍हें रडार और एयर डिफेंस सिस्‍टम से इंटरसेप्‍ट करना कतई आसान नहीं होगा। 

    फोर्स मल्‍टीप्‍लायर
    सैन्य दृष्टि से देखा जाए तो ‘घातक’ को अकेले लड़ने वाले प्लेटफॉर्म के बजाय फोर्स मल्टीप्लायर के रूप में तैयार किया जा रहा है. इसका इस्तेमाल उन मिशनों में किया जाएगा, जहां पायलट वाले विमानों के लिए खतरा अधिक होता है. इनमें दुश्मन की वायु रक्षा प्रणाली को निष्क्रिय करना (SEAD), रणनीतिक ठिकानों पर सटीक हमले करना और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध (Electronic Warfare) जैसे मिशन शामिल हैं. इसकी ऑटोनोमस कैपेबिलिटी इसे न्यूनतम मानवीय हस्तक्षेप के साथ मिशन पूरा करने में सक्षम बनाएंगी, जिससे पायलटों की सुरक्षा भी बढ़ेगी. विशेषज्ञों के अनुसार, ‘घातक’ की सबसे बड़ी ताकत इसका मैन्ड-अनमैन्ड टीमिंग (MUM-T) सिद्धांत होगा. इस व्यवस्था में भारतीय वायुसेना के Su-30MKI और भविष्य के AMCA जैसे लड़ाकू विमान कमांड प्लेटफॉर्म की भूमिका निभाएंगे, जबकि उनके साथ उड़ने वाले कई UCAV सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक डिकॉय या हमला करने वाले प्लेटफॉर्म के रूप में कार्य करेंगे. इससे एक ही मिशन में कई टार्गेट्स पर एक साथ एक्‍शन संभव होगा और दुश्मन के लिए वास्तविक खतरे की पहचान करना काफी मुश्किल हो जाएगा। 

    News Desk

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