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    दल-बदल कानून में अटल सरकार का बदलाव भी नहीं बचा पाएगा TMC को? 28 में 20 सांसद बागी खेमे में

    News DeskBy News DeskJune 16, 2026No Comments6 Mins Read
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    दल-बदल कानून में अटल सरकार का बदलाव भी नहीं बचा पाएगा TMC को? 28 में 20 सांसद बागी खेमे में
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    कलकत्ता

    राजनीति का सबसे कड़वा सच है कि सत्ता खिसकते ही सबसे पहले अपने ही साथ छोड़ते हैं और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी इस समय इसी कड़वे सच का सामना कर रही हैं. चुनावी हार के सदमे के बीच तृणमूल कांग्रेस (TMC) के दो कद्दावर चेहरे काकोली घोष और सुदीप बंदोपाध्याय ने 20 सांसदों के साथ मिलकर बगावत का बिगुल फूंक दिया है. इस बड़ी टूट ने ममता खेमे में हड़कंप मचा दिया है। 

    अब सवाल सिर्फ पार्टी टूटने का नहीं, बल्कि वजूद का है क्या ये बागी सांसद ममता से उनकी पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह भी छीन लेंगे? इस पूरे सियासी ड्रामे के बीच देश का 'दलबदल विरोधी कानून' (Anti-Defection Law) क्या ममता की नैया पार लगा पाएगा या बागियों का रास्ता साफ करेगा। 

    क्या है दलबदल विरोधी कानून ?

    हरियाणा में दलबदल का आया राम और गया राम वाला किस्सा जगजाहिर है. 1967 से 1983 के बीच यहां दल-बदल का खूब खेल चला. कांग्रेस से समाजवादी नेता जहां नाता तोड़ अलग हुए, वहीं कांग्रेस ने कई राज्यों में इसका जमकर फायदा उठाया और अपनी सरकार बनाई. ऐसे में देश में 'दल बदल निषेध कानून' लाने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी को जाता है। 

    इंदिरा गांधी की हत्या के बाद साल 1984 के ऐतिहासिक जनादेश के बाद जब कांग्रेस भारी बहुमत से सत्ता में आई, तो तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने देश की राजनीति में 'आया राम, गया राम' यानी विधायकों और सांसदों की खरीद-फरोख्त की बीमारी को जड़ से खत्म करने का फैसला किया. इसी मकसद से साल 1985 में राजीव गांधी सरकार 'दलबदल विरोधी कानून' लेकर आई और इसे संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) से सफलतापूर्वक पारित कराया गया. इस ऐतिहासिक पहल को 52वें संविधान संशोधन के जरिए संविधान की 10वीं अनुसूची के रूप में जोड़ा गया, ताकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक स्थिरता और शुचिता लाई जा सके। 

    अटल सरकार ने दो-तिहाई सदस्यों की लिमिट की 
    कानून के तहत अगर कोई सांसद या विधायक अपनी मर्जी से पार्टी छोड़ता है या सदन में अपनी पार्टी के 'व्हिप' का उल्लंघन करता है, तो उसकी सदस्यता रद्द की जा सकती है. इसके अनुसार एक तिहाई विधायक और सांसद अगर दलबदल करते हैं तो फिर उनकी सदस्यता बच सकती है। 

    दलबदल कानून में सबसे बड़ी कमजोरी या विसंगति यह थी कि व्यक्तिगत स्तर पर दल बदल पर तो रोक लगाई गई, लेकिन नेताओं को थोक में ऐसा करने को कानूनी मान्यता दे दी गई. इसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में एनडीए के शासनकाल 2003 में यह तय किया गया कि सिर्फ एक व्यक्ति ही नहीं, अगर सामूहिक रूप से भी दल बदला जाता है तो उसे भी असंवैधानिक करार दिया जाएगा। 

    संविधान में 91वां संशोधन कर सदस्यों की संख्या एक तिहाई से बढ़ाकर दो-तिहाई कर दी गई. इसी संशोधन में धारा 3 को पूरी तरह खत्म कर दिया गया, जिसके तहत एक तिहाई पार्टी सदस्यों को लेकर दल बदला जा सकता था. इसके जरिए दल बदल का कानून को रोकने और सख्त बनाने के लिए अटल सरकार ने दो-तिहाई सदस्यों की लिमिट लगाई थी, अब वो भी टूटता नजर आ रहा है। 

    ममता के केस में गणित
     संविधान के मुताबिक अगर किसी पार्टी के दो-तिहाई (2/3) सांसद या विधायक एक साथ अलग होते हैं, तो उन पर दल बदल कानून लागू नहीं होता. लोकसभा में 28 और राज्यसभा में 10 सांसद टीएमसी के हैं. लोकसभा सांसदों की कुल संख्या 28 के लिहाज से बागी हुए 20 सांसद हैं, जो दो-तिहाई के आंकड़े को आसानी से छू लिया है. ऐसे में दलबदल कानून ममता बनर्जी के हाथ बांध देगा. इस तरह कानूनन टीएमसी के बागी सांसदों की सदस्यता बची रहेगी। 

    राजनीतिक गलियारों और हालिया कानूनी बहसों में एक दिलचस्प पेंच सामने आया है. पार्टी से बगावत करने और अलग गुट बनाने के बावजूद तकनीकी और कानूनी रूप से ये बागी सांसदों ने एनसीपीआई में विलय कर दिया है, लेकिन पार्टी के कब्जे और चुनाव निशान पर दावेदारी के लिए जुलाई में स्पीकर से गुहार लगाएंगे. इसके अलावा ममता बनर्जी की पार्टी के बंगाल में 80 से 60 से ज्यादा विधायक अलग गुट बना लिए हैं और अपना नेता भी सदन में चुन लिया है। 

    महाराष्ट्र के शिंदे और अजित पवार मामलों ने देश को दिखाया है कि दो-तिहाई लिमिट होने के बाद भी दलबदल कानून अब पार्टियों को टूटने से बचाने में 'रामबाण' नहीं रहा. दलबदल कानून के तहत फैसला लेने का अंतिम अधिकार सदन के अध्यक्ष के पास होता है. जब तक स्पीकर आखिरी फैसला नहीं लेते, बागी सांसद तकनीकी रूप से सुरक्षित रहते हैं और यह समय उन्हें अपनी स्थिति मजबूत करने का मौका दे देता है। 

    दलबदल कानून केवल सांसदों की कुर्सी बचा सकता है, लेकिन पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह किसे मिलेगा इसका पर चुनाव आयोग ही फैसला करता है. काकोली घोष और सुदीप बंदोपाध्याय के गुट के पास दो तिहाई संसदों का समर्थन हासिल है. सुदीप बंद्योपाध्याय ने कहा है कि जब दो-तिहाई सांसदों के साथ अलग होते हैं तो पहले दिन मूल पार्टी पर अपना दावा नहीं कर सकते हैं. इसीलिए एनसीपीआई में विलय का रास्ता चुना. अब आगे की लड़ाई जुलाई में होगी, जब टीएमसी के बागी नेता पार्टी और चुनाव चिन्ह पर दावा जताएंगे?

    क्या ममता बनर्जी के हाथ से निकल जाएगी उनकी अपनी पार्टी?
    तकनीकी और संवैधानिक रूप से ऐसा होना बिल्कुल मुमकिन है, लेकिन यह डगर इतनी आसान नहीं होगी. पूरी रणनीति के तहत, बागी सांसद सबसे पहले स्पीकर के सामने अपने 'विधायी बहुमत' के दम पर खुद को 'असली टीएमसी' घोषित करने की मांग करेंगे. इसके बाद यह जंग चुनाव आयोग पहुंचेगी. यदि आयोग के सामने बागी गुट अपना संख्याबल साबित करने में सफल रहा, तो ममता बनर्जी को अपनी ही बनाई पार्टी का नाम और सिंबल गंवाना पड़ सकता है। 

    इतिहास पर नजर डालें तो हमेशा यही देखा गया है कि जब भी किसी पार्टी में दो गुट बनते हैं तो दोनों ही गुट खुद को 'असली पार्टी' बताते हैं ऐसे में फैसला चुनाव आयोग के हाथ में होता है. चुनाव आयोग देखता है कि पार्टी के निर्वाचित जनप्रतिनिधियों (सांसदों और विधायकों) में से कितने लोग किस गुट के साथ हैं। 

    आमतौर पर चुनाव आयोग किसी भी पार्टी के विवाद को सुलझाते समय यह बारीकी से जांचता है कि पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी, केंद्रीय पदाधिकारियों और जिला अध्यक्षों के बीच किसका दबदबा है. अगर संगठन के मोर्चे पर देखा जाए, तो ममता बनर्जी इस समय बेहद मजबूत स्थिति में हैं क्योंकि टीएमसी के कैडर और सांगठनिक ढांचे पर उनकी पकड़ अभी भी बरकरार है. हालांकि, इस मामले का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि शिवसेना और एनसीपी के हालिया विवादों में चुनाव आयोग ने संगठन के मुकाबले सदन के भीतर सांसदों और विधायकों की संख्या को ज्यादा प्राथमिकता दी थी। 

    News Desk

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