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    सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गृहिणी की मौत पर ₹30 हजार मासिक आय मानकर तय होगा मुआवजा

    News DeskBy News DeskJune 12, 2026No Comments5 Mins Read
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    सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: गृहिणी की मौत पर ₹30 हजार मासिक आय मानकर तय होगा मुआवजा
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    नई दिल्ली
    एक्सीडेंट में जब किसी इंसान की मौत होती है, तब उसकी कमाई या सैलरी के हिसाब से मुआवजा तय होता है. लेकिन होम मेकर महिलाओं से जुड़े केस में यह मामला उलझ जाता है, क्योंकि होम मेकर महिलाओं की कोई तय कमाई नहीं होती. अब सुप्रीम कोर्ट ने होम मेकर (गृहिणियों) के मुआवजे को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है. अदालत ने कहा कि जब किसी दुर्घटना के कारण गृहिणी की मौत हो जाती है, तब उसका मुआवजा तय करते हुए उनके योगदान का आकलन आवश्यक है. अदालत ने कहा कि गृहिणियों का योगदान केवल परिवार तक सीमित नहीं होता, बल्कि वो मानव संसाधन और राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.  ऐसे में उन्हें केवल “होममेकर” कहने के बजाय “नेशन बिल्डर” कहा जाना चाहिए। 

    होम मेकर की मौत पर 30 हजार रुपए मंथली के हिसाब से तय हो मुआवजा
    अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि गृहिणी द्वारा किए जाने वाले घरेलू काम और देखभाल की सेवाओं का आर्थिक मूल्य है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. दुर्घटना की शिकार गृहणियों के मामले में मुआवजे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने नई गाइडलाइन जारी करते हुए होम मेकर महिलाओं की मौत पर 30 हजार रुपए महीना के हिसाब से मुआवजा तय करने की बात कही। 

    एक्सीडेंट से जुड़े एक दावे की अपील पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला 
    वाहन दुर्घटना के दावों से जुड़ी एक अपील पर फैसला सुनाते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन.के. सिंह की बेंच ने कहा कि घर संभालने वाली महिला (होममेकर) का योगदान सिर्फ घर तक ही सीमित नहीं होता, बल्कि देश के निर्माण में भी उनकी अहम भूमिका होती है. कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजा तय करते समय घर संभालने वाली महिला की मौत या अक्षमता के कारण परिवार को घरेलू देखभाल के मामले में जो नुकसान होता है, उसे अलग से मान्यता दी जानी चाहिए। 

    जस्टिस संजय करोल की अध्यक्षता वाली पीठ ने इसी उद्देश्य से घरेलू देखभाल के नुकसान (Loss of Domestic Care) का मूल्य ₹30,000 प्रति माह निर्धारित किया है. पीठ ने यह भी कहा कि यह सिद्धांत पहले दिए गए फैसले में निर्धारित मानकों के अतिरिक्त है। 
    मुआवजा निर्धारण के लिए एक नया मार्गदर्शक सिद्धांत प्रदान करता है। 

    2001 में पंजाब की महिला की हादसे में मौत पर आया फैसला

    यह फैसला पंजाब में एक मोटर एक्सीडेंट दावे से जुड़ी अपील पर आया, जिसमें नवंबर 2001 में रेशमा नाम की एक महिला की सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी. उसके पति और तीन बच्चों ने मुआवज़े के लिए मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल का दरवाज़ा खटखटाया था. ट्रिब्यूनल ने 2003 में मुआवजा दिया, लेकिन यह मामला सालों तक मुकदमे में उलझा रहा, और पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने अपील पर दिसंबर 2024 में जाकर फैसला सुनाया। 

    दुर्घटना के दो दशक से भी ज्यादा समय बाद इस तरह की देरी पर चिंता जताते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर एक्सीडेंट मुआवजे के दाले पर आम तौर पर एक साल के अंदर फैसला हो जाना चाहिए. बेंच ने कहा ऐसे मामलों का फैसला आम तौर पर एक साल के अंदर हो जाना चाहिए। 

        कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस से मोटर एक्सीडेंट क्लेम मामलों की मॉनिटरिंग करने और यह पक्का करने के लिए सही एडमिनिस्ट्रेटिव निर्देश जारी करने को कहा कि ऐसे मामलों का निपटारा तय समय में हो जाए। 

        इस फैसले के दूरगामी असर होने की उम्मीद है क्योंकि पूरे भारत में कोर्ट आम तौर पर मृतक होममेकर्स के लिए मौजूदा न्यूनतम वेतन के आधार पर उन्हें एक काल्पनिक इनकम देकर मुआवजा तय करते हैं, और अक्सर उन्हें स्किल्ड या अनस्किल्ड वर्कर्स के बराबर मानते हैं। 
        सुप्रीम कोर्ट का फैसला उस तरीके से अलग है, यह मानते हुए कि घरेलू देखभाल के काम को पारंपरिक लेबर-मार्केट बेंचमार्क तक कम नहीं किया जा सकता। 

        कोर्ट की ये बातें उन मिसालों पर आधारित हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि होममेकर्स के योगदान की, बिना पेमेंट के भी, मापने लायक आर्थिक वैल्यू है। 

        कीर्ति बनाम ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2021) और अरुण कुमार अग्रवाल बनाम नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2010) सहित कई पिछले फैसलों में, सुप्रीम कोर्ट कोर्ट ने होममेकर्स द्वारा दी जाने वाली सेवाओं को गैर-कानूनी मानने के खिलाफ चेतावनी दी थी। 
        अदालत का यह ताजा फैसला एक कदम और आगे बढ़कर घरेलू देखभाल के नुकसान का आकलन करने के लिए हर महीने ₹30,000 का एक ठोस न्यूनतम बेंचमार्क तय करता है। 

        यह बेंचमार्क नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी (2017) में संविधान बेंच द्वारा तय किए गए सिद्धांतों के साथ काम करेगा, जो मोटर व्हीकल एक्ट के तहत मुआवजा तय करने के लिए एक मिसाल है। 

    News Desk

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