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    खेल

    1983 वर्ल्ड कप से पहले कप्तानी पर खुलासा, कपिल देव के नाम पर क्यों लगी मुहर

    News DeskBy News DeskJune 11, 2026No Comments4 Mins Read
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    1983 वर्ल्ड कप से पहले कप्तानी पर खुलासा, कपिल देव के नाम पर क्यों लगी मुहर
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    नई दिल्ली
    भारतीय क्रिकेट इतिहास के सबसे सुनहरे अध्याय- 1983 विश्व कप को लेकर पूर्व विकेटकीपर-बल्लेबाज सैयद किरमानी का एक पुराना लेकिन बेहद अहम खुलासा एक बार फिर सुर्खियों में है. किरमानी ने बताया है कि इस ऐतिहासिक टूर्नामेंट से ठीक पहले टीम इंडिया की कप्तानी को लेकर चयन समिति के भीतर गहन और निर्णायक मंथन चला था, जिसमें उनका नाम और दिलीप वेंगसरकर भी गंभीर दावेदारों के रूप में शामिल थे.

    … लेकिन अंतिम निर्णय उस खिलाड़ी के पक्ष में गया, जिसने आगे चलकर न सिर्फ उस विश्व कप की तस्वीर बदली, बल्कि भारतीय क्रिकेट के पूरे इतिहास को नई दिशा दे दी… और वह नाम था- कपिल देव.

    किरमानी के इस बयान ने 1983 विश्व कप से जुड़े उस कम चर्चित पहलू को फिर से चर्चा में ला दिया है, जो अब तक क्रिकेट इतिहास की परतों में दबा हुआ था.

    उस समय भारतीय चयन समिति की अध्यक्षता गुलाम अहमद कर रहे थे. उनके साथ अनुभवी चयनकर्ताओं की एक मजबूत टीम थी, जिसमें  बिशन सिंह बेदी, पंकज रॉय, चंदू बोर्डे और चंदू सरवते जैसे दिग्गज शामिल थे.

    किरमानी के अनुसार, वेस्टइंडीज दौरे के दौरान ही कप्तानी को लेकर अंदरखाने चर्चा तेज हो गई थी. यह बहस दो नामों के बीच सिमटी थी- किरमानी और वेंगसरकर. दोनों खिलाड़ियों के पास अपनी-अपनी मजबूत दावेदारी थी. एक ओर जहां किरमानी टीम के भरोसेमंद विकेटकीपर थे, वहीं वेंगसरकर शीर्ष क्रम के अनुभवी बल्लेबाज के रूप में स्थापित हो चुके थे.

    लेकिन इसी चर्चा के बीच एक महत्वपूर्ण तर्क सामने आया- क्या एक विकेटकीपर को कप्तानी का अतिरिक्त दबाव देना सही होगा? इसी सोच ने चयनकर्ताओं की दिशा बदल दी और अंतिम निर्णय की भूमिका तैयार की.

    कपिल देव की ओर झुकी तौल
    अंततः चयन समिति ने जिस खिलाड़ी पर भरोसा जताया, वह थे कपिल देव यह निर्णय उस समय भले ही साधारण चयन की तरह लगा हो, लेकिन इतिहास ने इसे भारतीय क्रिकेट का सबसे निर्णायक फैसला साबित कर दिया.

    कपिल देव की कप्तानी में भारत ने न सिर्फ विश्व कप में भाग लिया, बल्कि पूरे टूर्नामेंट की तस्वीर ही बदल दी. कमजोर मानी जाने वाली भारतीय टीम ने पहले दौर में इंग्लैंड और वेस्टइंडीज जैसी मजबूत टीमों को हराकर सबको चौंका दिया.

    25 जून 1983: इतिहास का अमर दिन
    25 जून 1983 को लॉर्ड्स के मैदान पर भारत ने वेस्टइंडीज को 43 रन से हराकर क्रिकेट इतिहास में स्वर्णिम अध्याय लिखा. यह वही वेस्टइंडीज टीम थी, जिसे उस समय दुनिया की सबसे मजबूत क्रिकेट टीम माना जाता था.

    इस जीत ने भारत को पहली बार 50 ओवर का विश्व कप दिलाया और ‘कपिल्स डेविल्स’ की एक ऐसी पहचान बनाई, जो आज भी प्रेरणा का स्रोत है.

    किरमानी का मानना है कि यह जीत सिर्फ एक ट्रॉफी नहीं थी, बल्कि भारतीय क्रिकेट की नींव थी, जिसने आने वाले दशकों में खेल की दिशा और दशा दोनों बदल दी.

    'पहला प्यार कभी नहीं भूलता'
    किरमानी ने भावुक होते हुए कहा कि 1983 की जीत भारतीय क्रिकेट के लिए 'पहले प्यार' जैसी है, जिसे कोई भी देशवासी कभी नहीं भूल सकता. उनके अनुसार, उस टीम ने न सिर्फ जीत हासिल की, बल्कि भारतीय क्रिकेट को आत्मविश्वास, पहचान और वैश्विक सम्मान दिलाया.

    वे यह भी कहते हैं कि इस उपलब्धि को हर वर्ष 25 जून को विशेष रूप से मनाया जाना चाहिए, क्योंकि इसी दिन भारतीय क्रिकेट ने दुनिया को अपनी असली ताकत दिखाई थी.

    सम्मान को लेकर सवाल
    किरमानी ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (BCCI) पर भी परोक्ष सवाल उठाए. उनका कहना है कि जिस तरह 2007 टी20 विश्व कप जीत के बाद महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी वाली टीम का भव्य सम्मान हुआ, वैसा 1983 के नायकों को नहीं मिला.

    उनका मानना है कि 1983 की टीम ने भारतीय क्रिकेट की आर्थिक और लोकप्रियता की नींव रखी, लेकिन समय के साथ उस योगदान को उतनी प्रमुखता नहीं मिली, जितनी मिलनी चाहिए थी.

    किरमानी ने यह भी कहा कि उस दौर के खिलाड़ियों ने भारतीय क्रिकेट को सिर्फ जीत नहीं दी, बल्कि उसे टीवी, स्पॉन्सरशिप और वैश्विक पहचान के नए युग में पहुंचाया.

    बदलता क्रिकेट और विकेटकीपर की भूमिका
    किरमानी ने आधुनिक क्रिकेट में विकेटकीपर की भूमिका पर भी विस्तार से बात की. उन्होंने कहा कि पहले विकेटकीपर को केवल स्टंप के पीछे की जिम्मेदारी निभाने वाला खिलाड़ी माना जाता था, लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है.

    उन्होंने एमएस धोनी का उदाहरण देते हुए कहा कि आज का विकेटकीपर मैदान का रणनीतिक केंद्र बन चुका है. वह गेंदबाजों को दिशा देता है, फील्ड सेट करता है और बल्लेबाजों की कमजोरियों को पढ़ने में अहम भूमिका निभाता है.

    उनके अनुसार, विकेटकीपर को अब केवल विशेषज्ञ नहीं, बल्कि 'आधुनिक ऑलराउंडर सोच' वाला खिलाड़ी माना जाना चाहिए.

    News Desk

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