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    होर्मुज संकट से निपटने की तैयारी! भारत का ₹40,000 करोड़ का मेगा प्लान, तेल-गैस सप्लाई होगी मजबूत

    News DeskBy News DeskJune 10, 2026No Comments5 Mins Read
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    होर्मुज संकट से निपटने की तैयारी! भारत का ₹40,000 करोड़ का मेगा प्लान, तेल-गैस सप्लाई होगी मजबूत
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    नई दिल्ली

    ईरान की अमेरिका और इजरायल के खिलाफ जंग एक बार फिर जोर पकड़ती दिख रही है. अमेरिका ने अपने अपाचे हेलिकॉप्टर पर हमले पर बदला लेने के लिए होर्मुज के पास ईरान के अहम ठिकानों पर बुधवार तड़के (भारतीय समय) हमला कर दिया. वहीं ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स यानी आईआरजीसी ने बहरीन स्थित अमेरिका के पांचवें बेड़े को निशाना बनाने का दावा किया है. अमेरिका और ईरान के बीच इस ताजा वार और पलटवार ने होर्मुज स्ट्रेट के जल्द दोबारा खुलने की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है. होर्मुज की नाकेबंदी की वजह से मंडराते तेल-गैस के संकट के बीच भारत एक ऐसे मेगा प्रोजेक्ट पर गंभीरता से कदम आगे बढ़ा रहा है, जो आने वाले दशकों के लिए देश की ऊर्जा सुरक्षा की तस्वीर बदल सकता है. ओमान से गुजरात तक अरब सागर के नीचे लगभग 2,000 किलोमीटर लंबी डीप-सी गैस पाइपलाइन बिछाने की योजना को फिर से गति मिली है. करीब 40,000 करोड़ रुपये की लागत वाले इस प्रोजेक्ट को भारत के लिए ‘होर्मुज संकट का स्थायी समाधान’ माना जा रहा है। 

    भारत अपनी जरूरत का 50 प्रतिशत से ज्यादा प्राकृतिक गैस आयात करता है. इसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से एलएनजी (LNG) के रूप में आता है और होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है. यह वही समुद्री रास्ता है, जहां हाल के महीनों में ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. अगर किसी वजह से होर्मुज स्ट्रेट बंद होता है या वहां जहाजों की आवाजाही प्रभावित होती है, तो भारत समेत दुनिया के कई देशों की ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है। 

    ओमान से गुजरात तक पाइपलाइन
    यही वजह है कि भारत अब ओमान से सीधे गैस लाने के विकल्प पर गंभीरता से विचार कर रहा है. प्रस्तावित पाइपलाइन ओमान को सीधे गुजरात से जोड़ेगी और इसके जरिए गैस समुद्र के रास्ते टैंकरों में लाने की बजाय सीधे पाइपलाइन से भारत पहुंचेगी. इससे न केवल सप्लाई अधिक स्थिर होगी बल्कि समुद्री संकटों का असर भी काफी हद तक कम हो जाएगा। 

    इस परियोजना की सबसे बड़ी खासियत इसकी तकनीकी जटिलता है. पाइपलाइन का कुछ हिस्सा समुद्र तल से 3,000 मीटर से भी अधिक गहराई में बिछाया जाएगा. इतनी गहराई पर पाइपलाइन निर्माण दुनिया की सबसे चुनौतीपूर्ण इंजीनियरिंग परियोजनाओं में गिना जाता है. अगर यह योजना सफल होती है तो यह दुनिया की सबसे गहरी समुद्री गैस पाइपलाइनों में से एक होगी। 

    इस प्रोजेक्ट को लंबे समय से बढ़ावा देने वाली कंपनी साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज (SAGE) का दावा है कि वह पहले ही तकनीकी और वित्तीय अध्ययन के साथ-साथ समुद्र तल का सर्वेक्षण भी कर चुकी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक पेट्रोलियम मंत्रालय ने अब सरकारी कंपनियों जैसे गेल, इंडिया ऑयल कॉर्पोरेशन और इंजीनियर्स इंडिया लिमिटेड को विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने का काम सौंपा है। 

    गैस आयात हो जाएगा सस्ता
    एनर्जी एक्सपर्ट्स का मानना है कि यह परियोजना सिर्फ गैस आयात का माध्यम नहीं होगी, बल्कि भारत और खाड़ी देशों के बीच रणनीतिक संबंधों को भी नई मजबूती देगी. ओमान को लंबे समय के लिए स्थायी ग्राहक मिलेगा, जबकि भारत को गैस की सुरक्षित और लगातार आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी। 

    वर्तमान में एलएनजी आयात की प्रक्रिया काफी लंबी और महंगी है. पहले गैस को तरल रूप में बदला जाता है, फिर विशेष जहाजों से हजारों किलोमीटर दूर ले जाया जाता है और भारत पहुंचने पर दोबारा गैस में परिवर्तित किया जाता है. इस पूरी प्रक्रिया में भारी खर्च आता है. प्रस्तावित पाइपलाइन के जरिए गैस सीधे स्रोत से उपभोक्ता तक पहुंचेगी. शुरुआती अनुमान के मुताबिक गैस परिवहन की लागत 2 से 2.25 डॉलर प्रति MMBtu के बीच रह सकती है, जो कई परिस्थितियों में एलएनजी आयात से प्रतिस्पर्धी साबित हो सकती है। 

    इस प्रोजेक्ट में क्या है रोड़ा?
    हालांकि इस महत्वाकांक्षी परियोजना के सामने कई बड़ी चुनौतियां भी हैं. सबसे बड़ी चुनौती इंजीनियरिंग की है. समुद्र की 3,000 मीटर गहराई पर पाइपलाइन बिछाना और उसका रखरखाव करना बेहद जटिल और महंगा काम होगा. किसी भी तकनीकी खराबी या रिसाव की स्थिति में मरम्मत करना आसान नहीं होगा. इसके लिए विशेष जहाजों और अत्याधुनिक उपकरणों की जरूरत पड़ेगी। 

    दूसरी बड़ी चुनौती लागत और फंडिंग की है. 40,000 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत शुरुआती आंकड़ा है. ऐसे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अक्सर लागत बढ़ जाती है. इसके अलावा यह भी तय करना होगा कि निवेश कौन करेगा, लागत का बंटवारा कैसे होगा और गैस खरीद के दीर्घकालिक समझौते किस प्रकार होंगे। 

    तीन दशक से अटका था काम
    फिर भी हालात बदल चुके हैं. तीन दशक पहले जब यह परियोजना पहली बार सामने आई थी, तब तकनीक और आर्थिक व्यवहार्यता सबसे बड़ी बाधा थीं. लेकिन अब ऊर्जा सुरक्षा राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा बन चुकी है. रूस-यूक्रेन युद्ध, लाल सागर संकट और अब होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते तनाव ने यह दिखा दिया है कि किसी एक समुद्री मार्ग पर अत्यधिक निर्भरता कितनी जोखिम भरी हो सकती है। 

    विशेषज्ञों का मानना है कि अगर यह परियोजना सफल होती है तो भविष्य में इसी नेटवर्क का इस्तेमाल हाइड्रोजन जैसे स्वच्छ ईंधनों के परिवहन के लिए भी किया जा सकता है. यानी यह सिर्फ आज की जरूरत नहीं, बल्कि आने वाले दशकों की ऊर्जा रणनीति का आधार बन सकती है। 

    यही कारण है कि ओमान-गुजरात डीप-सी गैस पाइपलाइन को सिर्फ एक ऊर्जा परियोजना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है. होर्मुज संकट ने जिस खतरे की ओर दुनिया का ध्यान खींचा है, भारत उसी का स्थायी समाधान खोजने में जुटा हुआ है. अगर यह मेगा प्लान जमीन पर उतरता है, तो देश की तेल-गैस आपूर्ति पहले की तुलना में कहीं अधिक सुरक्षित और भरोसेमंद हो सकती है। 

     

    News Desk

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