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    AI की बढ़ती भूख से UN चिंतित, 2030 तक पानी और बिजली की खपत चौंकाएगी दुनिया

    News DeskBy News DeskJune 7, 2026No Comments6 Mins Read
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    AI की बढ़ती भूख से UN चिंतित, 2030 तक पानी और बिजली की खपत चौंकाएगी दुनिया
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    नई दिल्ली
     आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर अक्सर एक तर्क दिया जाता है. लोग कहते हैं कि फ्यूचर में तकनीक सुधरेगी तो एआई मॉडल्स कम एनर्जी और रिसोर्सेज का इस्तेमाल करेंगे. यूनाइटेड नेशन्स की एक नई रिपोर्ट ने इस सोच को पूरी तरह गलत साबित कर दिया है. यूएन की इस रिपोर्ट में एआई के कारण पर्यावरण को होने वाले भारी नुकसान का डेटा दिया गया है. रिपोर्ट के मुताबिक साल 2030 तक एआई की बिजली खपत दोगुनी हो सकती है. तब यह पूरी दुनिया की कुल बिजली का 3 प्रतिशत हिस्सा अकेले खा जाएगा. इतना ही नहीं, एआई से होने वाला कार्बन उत्सर्जन ब्रिटेन जैसे देश के बराबर पहुंच जाएगा। 

    सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि एआई डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए इतना पानी लगेगा, जितना पूरी दुनिया की आबादी सालभर में भी नहीं पीती है. यह स्थिति पर्यावरण के लिए बेहद खतरनाक है। 

    जेवंस पैराडॉक्स का वह जाल क्या है जिसमें फंसकर एआई बढ़ा रहा है पर्यावरण की मुसीबत?

    यूएन की रिपोर्ट में एक बेहद जरूरी आर्थिक सिद्धांत का जिक्र किया गया है. इसे ‘जेवंस पैराडॉक्स’ कहा जाता है. यह सिद्धांत बताता है कि जब कोई नई टेक्नोलॉजी किसी रिसोर्स के इस्तेमाल को ज्यादा एफिशिएंट बनाती है, तो कुल खपत घटती नहीं है. इसके उलट उस रिसोर्स का कुल कंजम्पशन और ज्यादा बढ़ जाता है। 

    इस सिद्धांत का नाम मशहूर इकोनॉमिस्ट विलियम स्टेनली जेवंस के नाम पर रखा गया था. उन्होंने 19वीं सदी के इंग्लैंड में कोयले के इस्तेमाल के दौरान इस पैटर्न को देखा था. तब कोयले के इंजन ज्यादा एफिशिएंट हो गए थे. इसके बाद भी कोयले की कुल खपत कम नहीं हुई थी 

    असल में एफिशिएंसी बढ़ने से कोयले की लागत कम हो गई थी. कम लागत के कारण लोगों ने इसका इस्तेमाल बहुत ज्यादा बढ़ा दिया था. इससे कुल डिमांड में भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई थी. एआई के मामले में भी बिल्कुल ऐसा ही होने की आशंका है। 

    जैसे-जैसे एआई मॉडल्स ज्यादा सस्ते और बेहतर होते जाएंगे, वैसे-वैसे इनका इस्तेमाल तेजी से बढ़ेगा. लोग नए-नए कामों के लिए एआई का उपयोग शुरू कर देंगे. इससे एफिशिएंसी से होने वाली कोई भी बचत पूरी तरह खत्म हो जाएगी। 

    डेटा सेंटर्स दुनिया की कितनी बिजली और पानी सोख रहे हैं और इसके पीछे का सच क्या है?

        इस संकट के बड़े पैमाने को समझने के लिए डेटा सेंटर्स की मौजूदा स्थिति को देखना होगा. पिछले साल दुनिया के डेटा सेंटर्स ने मिलकर उतनी ही बिजली खर्च की, जितनी सऊदी अरब जैसा देश करता है. सऊदी अरब दुनिया का 11वां सबसे बड़ा बिजली कंज्यूमर देश है। 
        अगर साल 2030 तक एआई की बिजली डिमांड दोगुनी हो जाती है, तो इससे पर्यावरण पर भारी असर पड़ेगा. इस बढ़े हुए कार्बन फुटप्रिंट की भरपाई करने के लिए इंसान को बहुत बड़े कदम उठाने होंगे. इसके लिए करीब 10 सालों तक 6.7 बिलियन पेड़ उगाने होंगे। 
        इतना ही नहीं, साल 2030 तक इन डेटा सेंटर्स को चलाने के लिए 9.3 ट्रिलियन लीटर पानी की जरूरत होगी. यह पानी डेटा सेंटर्स के भारी-भरकम सर्वर्स को ठंडा रखने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा. इसके साथ ही इन सेंटर्स के लिए मेक्सिको सिटी के साइज से दस गुना ज्यादा जमीन की जरूरत पड़ेगी। 

    ग्लोबल लेवल पर एआई की ताकत का बंटवारा कैसे पर्यावरण के लिए नई असमानता पैदा कर रहा है?

    यूएन की रिपोर्ट केवल रिसोर्स के इस्तेमाल तक सीमित नहीं है. यह एआई बूम के पीछे छिपी गहरी असमानता को भी सामने लाती है. दुनिया में केवल 32 देश ऐसे हैं, जिनके पास एआई के लिए जरूरी क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। 

    हैरानी की बात यह है कि इस पूरी क्षमता का 90 प्रतिशत हिस्सा केवल अमेरिका और चीन के पास है. रिपोर्ट चेतावनी देती है कि इससे दुनिया में एक बड़ा डिजिटल डिवाइड पैदा हो रहा है. एक तरफ वे देश हैं जो एआई सिस्टम को पूरी तरह कंट्रोल करते हैं। 

    दूसरी तरफ वे देश हैं जो केवल इन सिस्टम्स का इस्तेमाल करते हैं. इन कमजोर देशों को पर्यावरण का बहुत बड़ा नुकसान झेलना पड़ता है. एआई के लिए जरूरी मिनरल्स का एक्सट्रैक्शन और खतरनाक ई-वेस्ट का बोझ अक्सर इन्हीं गरीब देशों पर पड़ता है। 

    एआई मॉडल्स के अलग-अलग टास्क पर्यावरण पर कितना और किस तरह का असर डालते हैं?

        एआई के काम करने के तरीके को दो मुख्य ताकतें तय करती हैं. पहला यह कि हम इसका कितना इस्तेमाल करते हैं. दूसरा यह कि हम इसका इस्तेमाल किस तरह करते हैं. एआई कई तरह के टास्क पूरे करता है। 
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        इसमें टेक्स्ट लिखना, कोड जेनरेट करना, इमेज बनाना और वीडियो बनाना शामिल है. इन सभी कामों को पूरा करने के लिए अलग-अलग कंप्यूटर पावर की जरूरत होती है. इमेज और वीडियो बनाने में टेक्स्ट के मुकाबले कहीं ज्यादा एनर्जी खर्च होती है। 

        सही मॉडल का चुनाव करना भी बेहद जरूरी है. हर एआई सिस्टम के काम करने की एनर्जी कॉस्ट अलग होती है. इसलिए रिस्पॉन्सिबल एआई के लिए पूरी वैल्यू चेन को संभालना होगा. इसमें मिनरल्स की माइनिंग से लेकर रीसाइक्लिंग और ई-वेस्ट का सही डिस्पोजल शामिल होना चाहिए। 

    दुनिया के बड़े देश इस संकट से निपटने के लिए क्या कदम उठा रहे हैं और कहां चूक हो रही है?

    आजकल दुनिया भर की सरकारें अपने पब्लिक सेक्टर में एआई को तेजी से अपना रही हैं. उदाहरण के लिए न्यूजीलैंड की सरकार ने एक नेशनल एआई स्ट्रेटजी तैयार की है. उन्होंने एक पब्लिक सर्विस एआई फ्रेमवर्क भी बनाया है। 

    यह फ्रेमवर्क सस्टेनेबल डेवलपमेंट की बात तो करता है, लेकिन इसमें एनवायरमेंटल डिस्क्लोजर की कोई शर्त नहीं है. वहां कोई भी रेगुलेटर एआई की बिजली खपत या एमिशन का डेटा इकट्ठा नहीं कर रहा है. ऑस्ट्रेलिया का भी ऐसा ही हाल है। 

    ऑस्ट्रेलिया के नेशनल फिल्म एंड साउंड आर्काइव ने ‘बॉवरबर्ड’ नाम का एक टूल बनाया है. यह टूल ऑडियो और वीडियो को ट्रांसक्राइब करने का काम करता है. वहीं वहां का वेटरन्स अफेयर्स डिपार्टमेंट दावों के निपटारे को तेज करने के लिए एआई का इस्तेमाल कर रहा है। 

    ये दोनों देश एआई रेगुलेशन के मामले में बहुत हल्का रुख अपना रहे हैं. इस अप्रोच के कारण एआई के बढ़ते एनवायरमेंटल कॉस्ट की अनदेखी हो रही है. पर्यावरण हमारी इकोनॉमी और वेलबीइंग की बुनियाद है. हमें अपनी सोच को बदलकर एक सस्टेनेबल टेक फ्यूचर की तरफ बढ़ना होगा। 

    News Desk

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