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    Home»राजनीती»ममता के गढ़ में बगावत के संकेत! TMC बैठक से 60 विधायक गायब, पार्टी में मचा हड़कंप
    राजनीती

    ममता के गढ़ में बगावत के संकेत! TMC बैठक से 60 विधायक गायब, पार्टी में मचा हड़कंप

    News DeskBy News DeskJune 1, 2026No Comments6 Mins Read
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    ममता के गढ़ में बगावत के संकेत! TMC बैठक से 60 विधायक गायब, पार्टी में मचा हड़कंप
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    कलकत्ता

    पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में सबकुछ ठीक नहीं है। कई विधायक और सांसद नाराज बताए जा रहे हैं। इसको बल रविवार को तब और मिला, जब अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के बाद ममता के घर होने वाली बैठक में 80 में से 60 विधायक पहुंचे ही नहीं। इससे हड़कंप मच गया। सूत्रों के अनुसार, ममता के घर पर रविवार को अहम बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें विधायकों को बुलाया गया था, लेकिन बैठक से 60 विधायक गायब रहे, जिससे उसे रद्द करना पड़ गया। हालांकि, बाद में पार्टी की ओर से सफाई पेश की गई कि अभिषेक और कल्याण बनर्जी पर हुए हमले के मामले में तमाम विधायक व्यस्त थे और यही वजह रही कि वे ममता की बैठक में नहीं पहुंचे।

    एनडीटीवी ने टीएमसी के सूत्रों के हवाले से बताया कि यह बैठक पार्टी के विधायक दल के नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय ने ममता बनर्जी के घर पर बुलाई थी। काफी देर तक विधायकों का इंतजार किया गया, लेकिन जब वे नहीं पहुंचे तो आखिरकार बैठक ही रद्द करनी पड़ी। गैर-हाजिर रहे विधायकों से संपर्क भी नहीं हो पा रहा था। इसकी वजह से भी सवाल खड़े होने लगे हैं कि क्या टीएमसी में बड़ी फूट पड़ने वाली है।

    पिछले महीने हुए बंगाल विधानसभा चुनाव में टीएमसी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। खुद भवानीपुर सीट से ममता बनर्जी चुनाव हार गईं। भाजपा ने कुल 208 सीटें जीतीं, जबकि टीएमसी को महज 80 सीटों से संतोष करना पड़ा। इस हार के बाद से ही दबी जुबान में ममता बनर्जी का और टीएमसी की पूर्व सरकार का खुलकर विरोध होने लगा। खुद टीएमसी के कई सांसद और विधायक अपनी ही पार्टी की पूर्व सरकार के खिलाफ आ गए और उसके कई फैसलों का विरोध किया। छह मई को ममता बनर्जी ने हार को लेकर एक बैठक बुलाई, जिसमें लगभग 10 विधायक पहुंचे ही नहीं।

    सिर्फ 20 विधायक पहुंचे, गायब हुए 60 नेता हुए ‘नॉट रीचेबल’
    टीएमसी सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, यह महत्वपूर्ण बैठक विधायी दल के नेता शोभनदेव चट्टोपाध्याय द्वारा ममता बनर्जी के कोलकाता स्थित आवास पर बुलाई गई थी. बैठक का मुख्य उद्देश्य चुनावों में मिली हार और अभिषेक बनर्जी पर हुए हमले के बाद की स्थिति की समीक्षा करना था. लेकिन जब बैठक शुरू होने का समय आया, तो वहां केवल 20 विधायक ही मौजूद थे. सूत्रों ने बताया कि जो 60 विधायक बैठक से अनुपस्थित रहे, जब पार्टी नेतृत्व ने उनसे संपर्क करने की कोशिश की, तो वे सभी पूरी तरह से ‘इनकम्युनिकेटो’ (संपर्क से बाहर) पाए गए। 

    इस महा-फियास्को पर पर्दा डालने के लिए टीएमसी के प्रवक्ता कुणाल घोष ने एक कमजोर स्पष्टीकरण देते हुए दावा किया कि जो विधायक बैठक में शामिल नहीं हो सके, वे दरअसल अभिषेक बनर्जी और वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी पर हुए हमलों के बाद विभिन्न इलाकों में विरोध प्रदर्शनों का आयोजन करने में व्यस्त थे. हालांकि, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में विधायकों का गायब होना महज एक इत्तेफाक नहीं, बल्कि सुनियोजित दूरी है। 

    फिर्हाद हकीम और मदन मित्रा दीदी के साथ, लेकिन जमीन खिसकी
    कालीघाट में मचे इस आंतरिक हाहाकार के बीच टीएमसी नेतृत्व के लिए एकमात्र क्षणिक राहत की बात यह रही कि पार्टी के कुछ पुराने और दिग्गज क्षत्रप जैसे फिर्हाद हकीम, नयना बंदोपाध्याय, मदन मित्रा, आशिमा पात्रा और कुणाल घोष बैठक में मौजूद रहे. इन कद्दावर नेताओं की उपस्थिति यह दर्शाती है कि वे संकट की इस सबसे काली घड़ी में ममता बनर्जी के साथ खड़े हैं। 

    लेकिन यह एकजुटता भी पार्टी के बिखराव को रोकने के लिए नाकाफी साबित हो रही है. यह आंतरिक विद्रोह ठीक उस समय सामने आया है जब महज 24 घंटे के भीतर सोनारपुर में पार्टी के सेकेंड-इन-कमांड अभिषेक बनर्जी को भीड़ द्वारा पीटा गया और हुगली के चंडीतला में वरिष्ठ सांसद कल्याण बनर्जी के सिर पर हमला किया गया. इन दोनों सिलसिलेवार हमलों को इस बात का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है कि वर्ष 2011 में वामपंथियों को उखाड़कर लगातार तीन बार बंगाल पर राज करने वाली टीएमसी की राजनीतिक जमीन और शासन पर से उसकी लोहे जैसी मजबूत पकड़ अब पूरी तरह ढीली हो चुकी है। 

    भवानीपुर में सुवेंदु से हार और काकोली घोष का इस्तीफा
    कभी खुद को अजेय समझने वाली तृणमूल कांग्रेस इस बार भाजपा के हाथों बेहद बुरी तरह चुनाव हार चुकी है, जो कुछ साल पहले तक राज्य में अपनी जमीन तलाश रही थी. इस शर्मनाक हार ने पार्टी के भीतर गंभीर अंतर्कलह और गुटबाजी को जन्म दे दिया है, जहां अब वरिष्ठ नेता खुलेआम ममता बनर्जी की चुनावी रणनीतियों पर सवाल उठा रहे हैं. सबसे बड़ा आघात तब लगा जब खुद ममता बनर्जी अपने सबसे मजबूत गढ़ माने जाने वाले भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के पोस्टर बॉय और वर्तमान मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी से चुनाव हार गईं। 

    कैसे भड़की अंसतोष?
    असंतोष की इसी आग में घी डालते हुए पार्टी की वरिष्ठ नेता काकोली घोष दस्तदार ने हाल ही में टीएमसी के कार्यकारी अध्यक्ष सुब्रत बख्शी को एक बेहद गुस्से से भरी चिट्ठी भेजकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया है. अपनी चिट्ठी में उन्होंने ममता बनर्जी को आड़े हाथों लेते हुए पार्टी को ‘पुराने ढर्रे’ और जमीनी तौर-तरीकों पर वापस लौटने की नसीहत दी है। 

    कई अन्य टीएमसी नेताओं ने दबी जुबान में स्वीकार किया है कि पार्टी अपने मूल आधार यानी ‘मां, माटी, मानुष’ से पूरी तरह भटक चुकी है और ममता बनर्जी सहित शीर्ष नेतृत्व अब आम कार्यकर्ताओं के लिए पूरी तरह ‘इनएक्सेसिबल’ हो चुका है. हालांकि, पार्टी ने सार्वजनिक रूप से आलोचना करने वाले असंतुष्टों पर नकेल कसने के लिए पांच सदस्यीय कमेटी का गठन किया है, लेकिन 60 विधायकों की यह खुली बगावत यह साफ बयां कर रही है कि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है और बंगाल की राजनीति में ममता राज का अंत बेहद करीब है। 

    हालांकि, पार्टी ने तब भी सफाई दी कि चिंता की कोई बात नहीं है और उन विधायकों ने पहले ही जानकारी दे दी थी। उन्हें उनके अपने क्षेत्रों में फैली अशांति के कारण वहीं रहने को कहा गया था। टीएमसी के कई सांसद जिसमें काकोली घोष भी शामिल हैं, ने भी खुलकर नाराजगी व्यक्त की और बारासात जिला अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपने ही पार्टी के सांसद कल्याण बनर्जी के खिलाफ ऐक्शन लेने की भी मांग की। वहीं, हार के तुरंत बाद पार्टी के प्रवक्ता रहे रीजू दत्ता ने भी विरोध करना शुरू कर दिया, जिससे उन्हें छह साल के लिए पार्टी से निकाल दिया गया। इसके बाद दत्ता ने खुलकर ममता और अभिषेक बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खाल दिया। वहीं, शांतनु सेन, अरूप चकवर्ती ने भी प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे दिया।

    News Desk

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