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    Home»राजनीती»MP राज्यसभा चुनाव में BJP का ‘सवर्ण कार्ड’, भदौरिया और कांतदेव सबसे आगे
    राजनीती

    MP राज्यसभा चुनाव में BJP का ‘सवर्ण कार्ड’, भदौरिया और कांतदेव सबसे आगे

    News DeskBy News DeskMay 26, 2026No Comments6 Mins Read
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    MP राज्यसभा चुनाव में BJP का ‘सवर्ण कार्ड’, भदौरिया और कांतदेव सबसे आगे
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    भोपाल 

    मध्य प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर राज्यसभा चुनाव की सरगर्मी तेज हो गई है। इस बार बीजेपी रणनीति में बड़ा बदलाव करने जा रही है। पार्टी के अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, बीजेपी इस बार 'सवर्ण' चेहरे पर दांव लगाने की तैयारी में है। बीजेपी अपनी दो सुरक्षित सीटों के साथ कांग्रेस के कब्जे वाली तीसरी सीट पर भी नजर रखे हुए है। पार्टी तीसरी सीट जीतकर दिल्ली (केंद्रीय नेतृत्व) को 'गिफ्ट' देना चाहती है। इसके लिए बीजेपी कांग्रेस से आए किसी नेता को चेहरा बना सकती है। पार्टी की नजर उन विधायकों पर भी है जो कांग्रेस का खेल बिगाड़ सकते हैं।

    पहली सीट का गणित

    सामान्य वर्ग को मौका देने की वजह
    मध्य प्रदेश से राज्यसभा की तीन सीटें खाली हो रही हैं। इनका कार्यकाल 26 जून 2026 को समाप्त होगा। इनमें दो सीटें बीजेपी (डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी और जॉर्ज कुरियन) और एक सीट कांग्रेस (दिग्विजय सिंह) के पास है। बीजेपी सूत्रों के मुताबिक, पिछले चुनावों में पार्टी ने दलित, ओबीसी और महिला कार्ड खेलकर सामाजिक संतुलन साधा था।

    इस बार समीकरण बदल रहे हैं। पार्टी अब ठाकुर या ब्राह्मण कोटे से किसी कद्दावर चेहरे को राज्यसभा भेजना चाहती है। इसी कड़ी में अरविंद भदौरिया और कांतदेव सिंह के नाम चर्चा में हैं। दोनों नेता आरएसएस के करीबी माने जाते हैं और संगठन में गहरी पकड़ रखते हैं।

    1. कांतदेव सिंह (प्रदेश उपाध्यक्ष): विंध्य क्षेत्र से आने वाले कांतदेव सिंह की जमीनी पकड़ मजबूत मानी जाती है। यदि बीजेपी किसी क्षत्रिय चेहरे को चुनती है तो वे सबसे प्रबल दावेदार हैं। वे प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा के करीबी हैं। उज्जैन संभाग के प्रभारी रहने के साथ सिंगरौली निकाय चुनाव में भी उनकी अहम भूमिका रही है।

    2. अरविंद भदौरिया: पूर्व मंत्री अरविंद भदौरिया का नाम भी इस रेस में बना हुआ है। संगठन और सरकार में काम करने का उनका लंबा अनुभव पार्टी के काम आ सकता है। 2020 में मप्र में हुए सत्ता परिवर्तन में अरविंद भदौरिया की अहम भूमिका थी। ज्योतिरादित्य सिंधिया 22 विधायकों के साथ कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए थे।

    तत्कालीन कमलनाथ सरकार अल्पमत में आ गई थी। 22 विधायकों को बैंगलुरू के एक रिसॉर्ट में रखा गया था। विधायकों को अलग-अलग जगहों से बैंगलुरू ले जाने और वहां रुकवाने की जिम्मेदारी अरविंद भदौरिया के पास थी। कमलनाथ सरकार गिरने के बाद शिवराज सरकार में भदौरिया को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। हालांकि, वे 2023 का विधानसभा चुनाव हार गए थे।

    एससी-एसटी वर्ग को एडस्ट किया जा सकता है
    सवर्ण कार्ड की चर्चा के बीच बीजेपी अन्य वर्गों को भी नजरअंदाज नहीं कर रही है।
    एससी वर्ग: चंबल-ग्वालियर क्षेत्र में अनुसूचित जाति की बड़ी आबादी को देखते हुए लाल सिंह आर्य का नाम चर्चा में है।

    एसटी वर्ग: बेहतर प्रदर्शन के आधार पर डॉ. सुमेर सिंह सोलंकी को दोबारा मौका मिल सकता है। मालवा के आदिवासी वोट बैंक को साधने के लिए रंजना बघेल का नाम भी चर्चा में है।

    जॉर्ज कुरियन: भरोसेमंद चेहरा फिर हो सकता है रिपीट

    केंद्रीय राज्यमंत्री जॉर्ज कुरियन को बीजेपी दोबारा राज्यसभा भेज सकती है। 1980 से पार्टी से जुड़े कुरियन उन वफादार नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने जनसंघ के दौर से पार्टी का झंडा थामे रखा है। वे फिलहाल मत्स्य पालन, पशुपालन और अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं।

    तीसरी सीट के राजनीतिक समीकरण को समझने के लिए राज्यसभा चुनाव के वोटिंग पैटर्न को समझना जरूरी है।
    न गुप्त मतदान, न ही ईवीएम का इस्तेमाल

    राज्यसभा चुनाव में न गुप्त मतदान होता है और न ही ईवीएम का इस्तेमाल होता है। राज्यसभा चुनाव में उम्मीदवारों के नाम के आगे एक से चार तक नंबर लिखा होता है। इसमें विधायकों को वरीयता के आधार पर उस पर चिह्न लगाना होता है। राज्यसभा चुनाव में जीत के लिए जरूरी वोटों की संख्या पहले से तय होती है।

    यह संख्या कुल विधायक और राज्यसभा सीटों के आधार पर तय होती है। इसमें एक विधायक के वोट की वैल्यू 100 होती है।
    कुल विधायकों की संख्या को 100 से गुणा किया जाता है

    राज्यसभा चुनाव में एक फॉर्मूला इस्तेमाल किया जाता है। इसमें कुल विधायकों की संख्या को 100 से गुणा किया जाता है। इसके बाद राज्यसभा सीटों की संख्या में एक जोड़कर भाग दिया जाता है। फिर कुल संख्या में एक जोड़ा जाता है। अंत में जो संख्या निकलती है, वही जीत के लिए जरूरी होती है।

    कांग्रेस के पास संख्या बल, लेकिन क्रॉस वोटिंग का डर
    मध्य प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट कांग्रेस के खाते में मानी जा रही है। हालांकि, बीजेपी इस सीट पर भी उम्मीदवार उतारने की तैयारी में है। कांग्रेस को आशंका है कि कुछ विधायक क्रॉस वोटिंग कर सकते हैं या मतदान से अनुपस्थित रह सकते हैं। इससे तीसरी सीट पर मुकाबला रोचक हो सकता है।

        दतिया से विधायक राजेंद्र भारती का चुनाव रद्द होने के बाद यह सीट फिलहाल खाली है।
        विजयपुर से विधायक मुकेश मल्होत्रा की सदस्यता समाप्त करने के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है। हालांकि, वे राज्यसभा चुनाव में मतदान नहीं कर पाएंगे।

        बीना से कांग्रेस विधायक निर्मला सप्रे हाल के दिनों में बीजेपी के कार्यक्रमों में नजर आई हैं। हालांकि, उन्होंने अब तक इस्तीफा नहीं दिया है। कांग्रेस उनसे संपर्क बनाए हुए है, लेकिन पार्टी के भीतर उनकी भूमिका को लेकर असमंजस है।

        अटेर से कांग्रेस विधायक हेमंत कटारे बजट सत्र में उप नेता प्रतिपक्ष पद से इस्तीफा दे चुके हैं। उन्होंने इसके पीछे पारिवारिक कारण बताए थे।

        टिमरनी से कांग्रेस विधायक अभिजीत शाह हाल ही में आरएसएस से जुड़े कार्यक्रम में शामिल हुए थे। इस कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर भी साझा किया गया।

        सुसनेर से कांग्रेस विधायक भैंरो सिंह परिहार ने हाल ही में कहा था कि उनका संघ से वैचारिक जुड़ाव है।

        कांग्रेस को आशंका है कि बीजेपी हाल ही में पार्टी छोड़कर आए किसी नेता को उम्मीदवार बना सकती है। संभावित नामों में सुरेश पचौरी की चर्चा सबसे ज्यादा है। माना जाता है कि उनके दोनों दलों के नेताओं से अच्छे संबंध हैं।

    कमलनाथ हो सकते हैं उम्मीदवार
    कांग्रेस आलाकमान विधायकों को एकजुट रखने के लिए कमलनाथ को मैदान में उतार सकती है। केंद्रीय नेतृत्व का मानना है कि इससे सीट सुरक्षित रहेगी। पीसीसी चीफ जीतू पटवारी, पूर्व पीसीसी चीफ अरुण यादव, पूर्व मंत्री कमलेश्वर पटेल और पूर्व सांसद मीनाक्षी नटराजन के नाम भी चर्चा में हैं।

    नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया है कि बीजेपी उनके विधायकों को तोड़ने के लिए पुराने मामलों को हथियार बना रही है।

    एक्सपर्ट बोले- कांग्रेस में एकजुटता मुश्किल
    वरिष्ठ पत्रकार एन के सिंह के मुताबिक, तीसरी सीट को लेकर बीजेपी से ज्यादा चुनौती कांग्रेस के सामने है। कमलनाथ का नाम इसलिए सामने आया है ताकि विधायकों को एकजुट किया जा सके, लेकिन यह मुश्किल काम है। कांग्रेस में गुटबाजी का रोग 50 साल पुराना है।

    2018 के चुनाव से पहले दिग्विजय सिंह ने पंगत में संगत कार्यक्रम चलाया था। उसे छोड़ दें तो कांग्रेस में हर समय गुटबाजी हावी रही है। दूसरी तरफ बीजेपी सेंधमारी में उस्ताद मानी जाती है। बीजेपी ऐसे मौके तलाशती रहती है।

    News Desk

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