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    भारत और अंटार्कटिका कभी एक थ,नई स्टडी में गोंडवाना महाद्वीप का खुलासा

    News DeskBy News DeskMay 18, 2026No Comments3 Mins Read
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    भारत और अंटार्कटिका कभी एक थ,नई स्टडी में गोंडवाना महाद्वीप का खुलासा
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    सियोल

     भारत लाखों साल पहले अंटार्कटिका का हिस्सा हुआ करता था। वैज्ञानिकों ने एक नई स्टडी में पाया है कि लाखों साल पहले ये महाद्वीप एक-दूसरे से अलग हुए थे, उससे पहले भारत और अंटार्कटिका एक विशाल प्राचीन पर्वत श्रृंखला के जरिए आपस में जुड़े हुए थे। आंध्र प्रदेश के विजयनगरम-सालूर इलाके की प्राचीन चट्टानों के अध्ययन से पता चलता है कि उनमें और पूर्वी अंटार्कटिका में पाई जाने वाली चट्टानों में काफी समानता है।

    शोधकर्ताओं का कहना है कि इन नतीजों से इस बात की पुष्टि होती है कि पूर्वी भारत और अंटार्कटिका कभी एक ही भूवैज्ञानिक प्रणाली का हिस्सा थे, जिसे रेनर ईस्टर्न घाट ओरोजेन कहा जाता है। यह रिसर्च भारत, ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने की है। उन्होंने ग्रैनुलाइट का अध्ययन किया, जो एक तरह की मेटामॉर्फिक चट्टानें हैं। ये पृथ्वी के बहुत अंदर बहुत ज्यादा गर्मी और दबाव में बनती हैं। ये चट्टानें उन घटनाओं के सुराग सहेजकर रखती हैं, जो अरबों साल पहले हुई थीं।

    प्राचीन खनिजों ने कहानी को सहेजा
    टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अनुसार, कोलकाता की प्रेसिडेंसी यूनिवर्सिटी में प्राकृतिक और गणितीय विज्ञान संकाय के डीन प्रोफेसर शंकर बोस ने बताया कि रिसर्च टीम ने जिरकॉन, गार्नेट और मोनाजाइट जैसे खनिजों का विश्लेषण करने के लिए खनिज परीक्षण की आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया।

    भूविज्ञान संकाय के एक सदस्य ने बताया कि जिरकॉन अपनी मजबूती के लिए जाना जाता है। यह बहुत गर्मी और दबाव में टिका रहता है, जबकि दूसरे खनिज नष्ट हो जाते हैं। अपनी इसी मजबूत प्रकृति के कारण जिरकॉन इन चट्टानों के भीतर एक छोटे टाइम कैप्सूल की तरह काम करता है। जिरकॉन क्रिस्टल के भीतर यूरेनियम और लेड जैसे रेडियोधर्मी तत्वों के क्षय का अध्ययन किया गया। इससे उन घटनाओं की सटीक जानकारी मिली, जो करोड़ों से लेकर अरबों साल पहले पूर्वी घाट क्षेत्र में घटित हुई थीं।

    आंध्र प्रदेश और पूर्वी अंटार्कटिका की चट्टानें
    वैज्ञानिकों ने पाया कि आंध्र प्रदेश और पूर्वी अंटार्कटिका की चट्टानों की उम्र, खनिजों की बनावट और रासायनिक विशेषताएं एक जैसी हैं। इन दोनों ही क्षेत्रों में भूवैज्ञानिक विकास के तीन प्रमुख चरणों के एक जैसे प्रमाण मिले हैं। बोस ने कहा कि विजयनगरम और सालुर की चट्टानों ने भूवैज्ञानिक इतिहास के उन्हीं तीन मुख्य चरणों को दर्ज किया है, जिनकी पहचान पहले ही पूर्वी अंटार्कटिका में की जा चुकी है।

    अध्ययन के अनुसार, पहला चरण 1,000 से 990 मिलियन वर्ष पहले हुआ था, जब एक बड़े महाद्वीपीय टकराव के दौरान चट्टानें 1,000 डिग्री सेल्सियस के करीब तापमान के संपर्क में आई थीं। इससे विशाल पर्वत श्रृंखला का निर्माण हुआ। दूसरा चरण 950 से 890 मिलियन वर्ष के बीच हुआ, उसमें चट्टानों के अंदर अधिक गर्मी और संरचनात्मक परिवर्तन शामिल थे। आखिरी यानी तीसरा चरण 570 से 540 मिलियन वर्ष पहले हुआ, जब खनिज समृद्ध तरल पदार्थ चट्टानों की दरारों से होकर गुजरे और एक विशिष्ट रासायनिक निशान छोड़ गए, जो भारत और अंटार्कटिका दोनों में हैं।

    गोंडवाना टूटने से भारत और अंटार्कटिका अलग हुए
    वैज्ञानिकों का मानना है कि गोंडवाना के टूटने से भारत और अंटार्कटिका अलग हो गए। ये दोनों भूभाग तब तक आपस में जुड़े रहे, जब तक कि 130 से 150 मिलियन वर्ष पहले सुपरकॉन्टिनेंट गोंडवाना टूटना शुरू नहीं हो गया। जैसे-जैसे भारतीय प्लेट उत्तर की ओर एशिया की तरफ खिसकी और अंटार्कटिका दक्षिण की ओर बढ़ा, आपस में जुड़ी हुई पर्वत श्रृंखला टूटकर अलग हो गई। आज ये क्षेत्र हजारों किलोमीटर लंबे महासागर से अलग किए गए हैं लेकिन चट्टानें अभी भी अपने साझा भूवैज्ञानिक अतीत के प्रमाण सहेजकर रखे हुए हैं।

     

    News Desk

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