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    Home»देश»तहव्वुर राणा की नागरिकता पर क्यों बेबस है कनाडा? जानिए पूरा कानूनी खेल
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    तहव्वुर राणा की नागरिकता पर क्यों बेबस है कनाडा? जानिए पूरा कानूनी खेल

    News DeskBy News DeskMay 14, 2026No Comments6 Mins Read
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    तहव्वुर राणा की नागरिकता पर क्यों बेबस है कनाडा? जानिए पूरा कानूनी खेल
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     टोरंटो

    भारतीय समेत दुनियाभर के कई लोग बसने के लिए कनाडा को इसलिए भी पसंद करते हैं क्योंकि एक बार यहां की नागरिकता हासिल कर ली जाए तो इस देश से निकाले जाने का खतरा लगभग खत्म हो जाता है और फिर यहां के मूल निवासियों की तरह यहां के अधिकार भी हासिल किए जा सकते हैं. कुछ मिलाकर कनाडा में नागरिकता छीनी जानी इतनी आसान नहीं है. इसका बड़ा उदाहरण मुंबई 26/11 आतंकी हमले के आरोपी तहव्वुर हुसैन राणा का केस है। 

    अमेरिका से भारत प्रत्यर्पित किए जाने के बाद अब उस पर भारत में मुकदमा चलने की तैयारी है लेकिन इसी बीच कनाडा में उससे जुड़ा एक दूसरा बड़ा सवाल भी लगातार उठ रहा है. अगर कनाडाई एजेंसियों को सालों पहले ही शक हो गया था कि राणा ने झूठ बोलकर नागरिकता हासिल की थी, तो उसकी नागरिकता अब तक रद्द क्यों नहीं हुई?

    यह सवाल केवल राणा तक सीमित नहीं है. पिछले कुछ सालों में सामने आए मामलों से पता चलता है कि कनाडा में एक बार नागरिकता मिलने के बाद उसे वापस लेना बेहद लंबी, जटिल और धीमी प्रक्रिया बन जाती है. कई मामलों में सरकार को 10 से 20 साल तक लग जाते हैं। 

    तहव्वुर राणा पर क्या हैं आरोप?
    तहव्वुर हुसैन राणा पर आरोप है कि उसने 2000 में कनाडाई नागरिकता के लिए आवेदन करते समय गलत जानकारी दी थी. उसने दावा किया था कि वह ओटावा में रह रहा है और कनाडा में लगातार मौजूद था. लेकिन बाद में RCMP और अमेरिकी एजेंसियों की जांच में ऐसे दस्तावेज सामने आए जिनसे पता चला कि वह उस दौरान अमेरिका के शिकागो में रह रहा था. कनाडा में दिए गए उसके पते पर दूसरे लोग रहते थे और पड़ोसियों ने भी कहा कि उन्होंने राणा को वहां कभी नहीं देखा। 

    जांच में यह भी सामने आया कि राणा शिकागो में कई कारोबार चला रहा था. इसके बावजूद उसे 2001 में कनाडाई नागरिकता और पासपोर्ट दोनों मिल गए. बाद में भारतीय एजेंसियों ने आरोप लगाया कि उसने इसी कनाडाई पासपोर्ट का इस्तेमाल करते हुए मुंबई हमले से पहले भारत की यात्रा की थी। 

    आखिर कनाडा में नागरिकता रद्द करना इतना मुश्किल क्यों?

    नागरिकता “अधिकार” बन जाती है
    कनाडा में एक बार नागरिकता मिलने के बाद व्यक्ति को लगभग वही संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा मिलती है जो जन्म से कनाडाई नागरिकों को मिलती है. यही वजह है कि सरकार किसी की नागरिकता बिना मजबूत कानूनी प्रक्रिया के नहीं छीन सकती. अदालतें यह सुनिश्चित करती हैं कि हर व्यक्ति को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका मिले। 

    इसी वजह से नागरिकता रद्द करने के मामलों में विस्तृत जांच होती है, अंतरराष्ट्रीय रिकॉर्ड जुटाए जाते हैं, अदालत में सबूत पेश होते हैं और अपील की कई परतें होती हैं. इन सबमें सालों लग जाते हैं। 

    बार-बार बदलते रहे कानून
    यह देरी सिर्फ कानूनी प्रक्रिया की वजह से नहीं हुई. कनाडा में नागरिकता कानून खुद कई बार बदले गए. 2015 में तत्कालीन प्रधानमंत्री Stephen Harper की कंजर्वेटिव सरकार ने कानून बदलकर आतंकवाद, जासूसी और राजद्रोह जैसे मामलों में नागरिकता रद्द करना आसान बना दिया था. सरकार का तर्क था कि जो व्यक्ति कनाडा के खिलाफ गंभीर अपराध करे, उसे नागरिकता रखने का अधिकार नहीं होना चाहिए। 

    लेकिन 2015 चुनाव में जस्टिन ट्रूडो और लिबरल पार्टी ने इसका विरोध किया. उनका प्रसिद्ध नारा था- “A Canadian is a Canadian is a Canadian.” लिबरल सरकार का कहना था कि दोहरी नागरिकता रखने वालों को अलग तरीके से ट्रीट करना गलत है। 

    इसके बाद 2017-18 में नियम फिर बदले गए. अब कनाडा में नागरिकता केवल इन आधारों पर छीनी जा सकती है:

        धोखाधड़ी
        गलत जानकारी
        तथ्यों को छिपाना

    यानी आतंकवाद में दोषी ठहराया जाना अपने आप नागरिकता खत्म करने का आधार नहीं रह गया.

    सरकार के पास सीमित संसाधन
    इमिग्रेशन विशेषज्ञों का कहना है कि कनाडा के पास ऐसे मामलों को तेजी से निपटाने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं. हर मामले में विदेशों से रिकॉर्ड मंगाने पड़ते हैं, पुराने दस्तावेजों की जांच होती है, गवाहों से पूछताछ होती है और अदालत में लंबी सुनवाई चलती है. राणा केस में जांच 2009 में शुरू हुई थी, लेकिन 2024 में जाकर सरकार ने संघीय अदालत से अंतिम फैसला मांगा। 

    आरोपी के बचाव का हिस्सा बन जाती है लंबी देरी

    दिलचस्प बात यह है कि सालों की देरी बाद में आरोपियों के लिए कानूनी बचाव भी बन जाती है. राणा ने भी अदालत में कहा कि इतने पुराने मामलों की घटनाएं अब उसे याद नहीं हैं. कई मामलों में आरोपी यह दलील देते हैं कि सबूत पुराने हो चुके हैं, गवाह उपलब्ध नहीं हैं और सरकार ने कार्रवाई में अत्यधिक देरी की. इससे प्रक्रिया और जटिल हो जाती है। 

    सुरक्षा और अधिकारों के बीच फंस गया कनाडा
    तहव्वुर राणा केस ने कनाडा के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है. क्या देश नागरिक अधिकारों की रक्षा करते-करते राष्ट्रीय सुरक्षा मामलों में बहुत धीमा हो गया है?

    मानवाधिकार विशेषज्ञ कहते हैं कि नागरिकता छीनना बेहद गंभीर कदम है और इसमें जल्दबाजी नहीं होनी चाहिए. दूसरी तरफ आलोचकों का तर्क है कि अगर किसी ने धोखे से नागरिकता हासिल की हो, तो कार्रवाई दशकों तक नहीं चलनी चाहिए. यही कारण है कि यह मामला अब केवल एक आतंकी आरोपी का नहीं, बल्कि कनाडा की पूरी इमिग्रेशन और नागरिकता प्रणाली की परीक्षा बन चुका है। 

    दूसरे देशों से कनाडा कितना अलग?
        ब्रिटेन ने 2010 के बाद से 1,500 से ज्यादा लोगों की नागरिकता रद्द की है, जिनमें बड़ी संख्या आतंकवाद और धोखाधड़ी के मामलों की थी। 
        अमेरिका भी हाल के सालों में ऐसे मामलों में आक्रामक रुख दिखा रहा है.

    इसके मुकाबले कनाडा में नागरिकता रद्द करने के मामले बेहद कम हैं. 2024 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक-

        दो दर्जन मामलों में कार्रवाई हुई
        सात मामले अदालत में लंबित हैं
        90 से ज्यादा मामलों में सरकार ने कार्रवाई आगे नहीं बढ़ाई

    अब आगे क्या होगा?
    राणा की नागरिकता रद्द करने का मामला अभी भी कनाडा की संघीय अदालत में लंबित है. अगर अदालत सरकार के पक्ष में फैसला देती है, तो उसकी कनाडाई नागरिकता समाप्त हो सकती है लेकिन इसमें अभी और समय लग सकता है. इस बीच भारत में उस पर 26/11 मुंबई हमले की साजिश में मुकदमा चलेगा। 

    News Desk

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