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    राजनीती

    ममता का ‘No इस्तीफा’ स्टंट, राहत की लाइफलाइन सिर्फ कल तक

    News DeskBy News DeskMay 6, 2026No Comments6 Mins Read
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    ममता का ‘No इस्तीफा’ स्टंट, राहत की लाइफलाइन सिर्फ कल तक
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    कलकत्ता

    पश्चिम बंगाल के चुनाव नतीजे चार मई को आ गए. इस बार विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने परचम लहराया और इस तरह बीते 15 सालों से टीएमसी की सत्ता का सूपड़ा साफ हो गया. चुनाव नतीजे आने के बाद से ही अब तक सीएम रहीं ममता बनर्जी आक्रामक मोड में हैं. उन्होंने पहले तो यह आरोप लगाया कि मतगणना केंद्रों पर वोटों की हेरफेर हुई है. यहां तक कि उन्होंने कहा कि कुछ गुंडों ने उन्हें भवानीपुर के मतगणना केंद्र पर पीटा भी। 

    ममता बनर्जी ने कहा- वह हारी नहीं, उन्हें हराया गया
    मंगलवार शाम को ममता बनर्जी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की और बीजेपी पर तमाम आरोप लगाते हुए कहा कि, उनके सीएम पद से इस्तीफा देने का सवाल नहीं. ममता बनर्जी के इस बयान से राज्य में एक तरह का संवैधानिक संकट खड़ा होने की आशंका जताई जा रही है. सवाल उठ रहे हैं कि ममता ने इस्तीफा नहीं दिया तो क्या होगा? असल में बीजेपी 10 मई से पहले-पहले शपथ ग्रहण की तैयारी में जुटी है। 

    बुधवार को छह तारीख हो चुकी है. सात मई 2026 को पश्चिम बंगाल की 17वीं विधानसभा का कार्यकाल समाप्त हो रहा है. ऐसा होने पर सभी पद संवैधानिक रूप से खुद ही समाप्त हो जाएंगे. ऐसे में ममता बनर्जी खुद-ब-खुद सीएम नहीं रहेंगी. यानी वह इस्तीफा दें या न दें, विधानसभा भंग होने के बाद वह वैसे भी सीएम नहीं रहने वाली हैं। 

    सिर्फ आज तक ही है उनके इस बयान का मतलब?
    यानी ममता बनर्जी के इस्तीफा न देने की मियाद सिर्फ एक दिन यानी आज ही के दिन तक है.  इसके बाद उनके इस बयान कि मैं 'इस्तीफा नहीं दूंगी.' इसका भी कोई मतलब नहीं रह जाएगा. चुनाव आयोग (ECI) ने चुनावी प्रक्रिया पूरी होने के बाद नई विधानसभा के गठन के लिए आधिकारिक अधिसूचना जारी कर दी है और इसे राज्यपाल को भेज भी दिया है तो ममता बनर्जी के इस्तीफा देने या न देने के लिए भी सिर्फ आज ही का दिन है। 

    वैसे भी ममता बनर्जी बीते तीन महीने से औपचारिक तौर पर सीएम नहीं हैं. इस बात को बताया है टीएमसी सांसद और वरिष्ठ वकील कल्याण बनर्जी ने. उन्होंने ममता बनर्जी का बचाव करते हुए कहा कि ममता व्यावहारिक रूप से सीएम के तौर पर काम नहीं कर रही थीं. उन्होंने कहा कि 'पिछले तीन महीनों से राज्य में आचार संहिता लागू थी, इसलिए ममता बनर्जी व्यावहारिक रूप से मुख्यमंत्री के तौर पर काम नहीं कर रही थीं. ऐसे में इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता। 

    कल्याण बनर्जी ने कहा, 'पिछले 3 महीनों से मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लागू है. सरकार कौन चला रहा था? मुख्य सचिव. इसलिए पिछले 3 महीनों से ममता बनर्जी मुख्यमंत्री के तौर पर काम नहीं कर रही थीं. फिर इस्तीफे का सवाल कहां है?'

    हालांकि ममता बनर्जी के बयान ने ये एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि क्या कोई मुख्यमंत्री चुनाव हारने के बाद भी पद पर बना रह सकता है? संविधान क्या कहता है? दो बड़े कानून के जानकारों ने इस पर अपनी राय दी है। 

    क्या कहते हैं एक्सपर्ट?
    वकील और संविधान के जानकार ज्ञानंत सिंह कहते हैं कि ममता का यह बयान संविधान से ज्यादा एक राजनीतिक चाल है. यानी इसका असर कानूनी कम और राजनीतिक ज्यादा होगा. उन्होंने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 164 के मुताबिक मुख्यमंत्री और बाकी मंत्री राज्यपाल की मर्जी तक अपने पद पर रहते हैं. इसका मतलब यह है कि राज्यपाल चाहें तो ममता को हटा सकते हैं.लेकिन एक पेच है। 

    अगर राज्यपाल अभी ममता को हटाते हैं और नई सरकार नहीं बनती तो राज्य में एक खालीपन आ जाएगा यानी राज्य चलाने वाला कोई नहीं होगा. यह संवैधानिक रूप से सही नहीं होगा. इसके अलावा उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 356 के तहत अगर ममता खुद को मुख्यमंत्री मानते हुए बड़े फैसले लेने लगें तो राज्यपाल राष्ट्रपति शासन लगाने की सिफारिश कर सकते हैं। 

    एक और अहम बात उन्होंने यह बताई कि अगर कोई मुख्यमंत्री विधानसभा में बहुमत साबित नहीं कर पाता तो राज्यपाल किसी नए मुख्यमंत्री को नियुक्त कर सकते हैं. भले ही हारने वाला मुख्यमंत्री इस्तीफा देने से मना कर दे. एक और जरूरी बात यह है कि पुरानी विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो चुका है और नई विधानसभा के लिए चुनाव हो चुके हैं. इसलिए SR बोमई वाला फ्लोर टेस्ट का नियम यहां लागू नहीं होगा. पुरानी विधानसभा में ममता को बिना फ्लोर टेस्ट के भी हटाया जा सकता है। 

    ममता न दें इस्तीफा तो राज्यपाल कर सकते हैं बर्खास्त
    वहीं, सुप्रीम कोर्ट के वकील और संविधान के जानकार आर के सिंह और भी सीधी बात करते हैं. वो कहते हैं कि अगर ममता इस्तीफा नहीं देतीं तो राज्यपाल सीधे उन्हें बर्खास्त कर सकते हैं. उन्होंने एक बहुत दिलचस्प बात कही. उन्होंने कहा कि जिस दिन विधानसभा का कार्यकाल खत्म हो जाता है, उस दिन से मौजूदा मुख्यमंत्री संविधान की भाषा में 'संवैधानिक रूप से मृत' हो जाते हैं. यानी कानूनी तौर पर उनका अस्तित्व खत्म हो जाता है. और हमारे संविधान में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है कि कोई 'संवैधानिक रूप से मृत' नेता देश या राज्य चला सके. उन्होंने संविधान के चार अनुच्छेदों का हवाला दिया। 

    क्या कहते हैं संविधान के अनुच्छेद 164 और 172
    अनुच्छेद 164 कहता है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करते हैं और मंत्री राज्यपाल की मर्जी तक पद पर रहते हैं. सरकार तभी तक चलती है जब तक उसे विधानसभा का भरोसा मिला हुआ है. जैसे ही बहुमत जाता है, मुख्यमंत्री को इस्तीफा देना चाहिए. अनुच्छेद 163 कहता है कि राज्यपाल आमतौर पर मंत्रिपरिषद की सलाह पर चलते हैं. लेकिन जब नई सरकार बनानी हो या बहुमत खो जाए तो राज्यपाल अपनी मर्जी से फैसला ले सकते हैं। 

    अनुच्छेद 172 कहता है कि विधानसभा का कार्यकाल 5 साल का होता है. जब यह खत्म होता है तो नई विधानसभा को सत्ता में आना ज़रूरी हो जाता है. अनुच्छेद 174 राज्यपाल को विधानसभा बुलाने, बंद करने और भंग करने का अधिकार देता है. चुनाव में जब किसी पार्टी को साफ बहुमत मिलता है तो राज्यपाल उस बहुमत वाले नेता को सरकार बनाने का मौका दे सकते हैं। 

    उन्होंने SR बोमई केस का भी जिक्र किया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बहुमत की जांच विधानसभा में होनी चाहिए. लेकिन अगर कोई सरकार संविधान के नियम मानने से ही इनकार कर दे तो राज्यपाल बेबस नहीं हैं. ऐसी स्थिति में राज्यपाल पूरी मंत्रिपरिषद को बर्खास्त कर सकते हैं और नई सरकार बनवा सकते हैं। 

    News Desk

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